श्रीमद्भगवद्गीता
अध्यात्मज्ञाननित्त्यत्वं मुद्रण ई-मेल
अध्यात्मज्ञाननित्त्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा ॥ ११ ॥

अध्यात्मज्ञान में नित्यस्थित और तत्वज्ञान के अर्थरुप परमात्मा को ही देखना यह सब ज्ञान है; इससे विपरीत है, वह अज्ञान है ।

 
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि मुद्रण ई-मेल
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्य्ते ॥ १२ ॥

जो जाननेयोग्य है जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है उसको कहुँगा । वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही ।

 
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतो मुद्रण ई-मेल
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥

वह सब ओर हाथ पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है। क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ।

 
सर्वेन्द्रियगुणाभासं मुद्रण ई-मेल
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥

वह इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है परंतु इन्द्रियोंसे रहित है तथा आसक्तिरहित होने पर भी सबका धारण पोषण करने वाला और निर्गुण होनेपर भी गुणोंको भोगनेवाला है ।

 
बहिरन्तश्च भूतानाम मुद्रण ई-मेल
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मात्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥

वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परीपूर्ण है और चर अचर भी वही है । और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और दूर में भी स्थित वही है ।

 
अविभक्तं च भूतेषु मुद्रण ई-मेल
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥

वह परमात्मा परिपूर्ण होने पर भी सभी भूतों में विभक्त सा प्रतीत होता है । तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरुप से पालन पोषण करने वाला, रुद्र रुप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मा रुप से सब को उत्पन्न करनेवाला है ।

 
ज्योतिषामपि तज्ज्योति मुद्रण ई-मेल
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥

वह परब्रह्म ज्योतियों की भी ज्योति एवं माया से परे कहा जाता है । वह परमात्मा बोधस्वरुप, जानने के योग्य एवं तत्त्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सब के हृदय में विशेष रुप से स्थित है ।

 
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं मुद्रण ई-मेल
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और परमात्मा का स्वरुप संक्षेप से कहा गया । मेरा भक्त इनको तत्त्वसे जानकर मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है ।

 
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