श्रीमद्भगवद्गीता
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु मुद्रण ई-मेल
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥

सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य उत्तम कर्म करनेवालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है ।

 
रजसि प्रलयं गत्वा मुद्रण ई-मेल
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥

रजोगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होने वाला कर्मो की आसक्तिवाले मनुष्योंमें उत्त्पन्न होता है, तमोगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्त्पन्न होता है ।

 
कर्मणः सकृतस्याहुः मुद्रण ई-मेल
कर्मणः सकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥

सात्त्विक कर्मो का फल सुख, ज्ञान और वैराग्यादि कहा गया है - राजस कर्मो का फल दुःख और तामस कर्मो का फल अज्ञान कहा है ।

 
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं मुद्रण ई-मेल
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥

सत्त्वगुण से ज्ञान, रजोगुण से निस्सन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्त्पन्न होता है ।

 
ऊध्वँ गच्छन्ति सत्त्वस्था मुद्रण ई-मेल
ऊध्वँ गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥

सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते है, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में मनुष्यलोक में ही रहते हैं और तमोगुण में स्थित तामस पुरुष कीट, पशु आदि मूढ़योनियों को तथा नरक को प्राप्त होते है ।

 
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं मुद्रण ई-मेल
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥

जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे मुझ को तत्त्वसे जानता है, उस समय वह मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है ॥ १९ ॥

 
गुणानेतानतीत्य मुद्रण ई-मेल
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहेसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥

यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणतरुप तीनों गुणों का पार करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है ॥ २० ॥

 
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो मुद्रण ई-मेल
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥

अर्जुन बोले – इन तीनों गुणो से अतीत पुरुष किन किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है ? ॥ २१ ॥

 
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