श्रीमद्भगवद्गीता
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मुद्रण ई-मेल
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥

इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें भी व्याकुल नहीं होते ।

 
मम योनिर्महद्ब्रह्म मुद्रण ई-मेल
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥

अर्जुन मेरी मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भधान का स्थान है और मैं उस योनिमें गर्भ को स्थापन करता हूँ । उस जड चेतन के संयोगसे सब भूतों की उत्पत्ति होती है ।

 
सर्वयोनिषु कौन्तेय मुद्रण ई-मेल
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

प्रकृति जो सभी शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं उन सब की गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैं बीज को स्थापन करनेवाला पिता हूँ ।

 
सत्त्वं रजस्तम इति मुद्रण ई-मेल
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबन्धन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण – ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी शरीर में बाँधते हैं ।

 
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वा मुद्रण ई-मेल
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बन्धाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥

हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित है , वह ज्ञान और सुखके सम्बन्ध से यानी के अभीमान से बाँधता है ।

 
रजो रागात्मकं विद्धि मुद्रण ई-मेल
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबन्धाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७ ॥

रागरुप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान । वह इस जीवत्मा को कर्मों के और उनके फलके सम्बन्ध से बाँधता है ।

 
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मुद्रण ई-मेल
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबन्धाति भारत ॥ ८ ॥

हे भारत ! तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है । तमोगुण देहाभिमानियोंको मोहित कर अविवेकी बनाता है । तमोगुण प्रमाद, आलस और निद्रा द्वारा जीवात्मा को बाँधता है ।

 
सत्त्वं सुखे सञ्जयति मुद्रण ई-मेल
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ ९ ॥

हे अर्जुन ! सत्त्वगुण सुखमें, रजोगुण कर्ममें तथा तमोगुण प्रमाद में लगाता है ।

 
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