श्रीमद्भगवद्गीता
तदित्यनभिसन्धाय मुद्रण ई-मेल
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥

तत् इस परमात्मा के नामका उच्चारण करके ही भोतिक फल को न चाहनेवाले पुरुषों - मोक्ष की आकाङ्क्षा से (शास्त्रविधिसे नियत) यज्ञ, दान और तपरुप क्रियाएँ करते हैं ।

 
सद्भावे साधुभावे च मुद्रण ई-मेल
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥

सत् इस परमात्मा के नामका सत्यभावमें और श्रेष्ठभावमें प्रयोग किया जाता हैं तथा हे पार्थ उत्तम कर्ममें भी सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है ।

 
यज्ञे तपसि दाने च मुद्रण ई-मेल
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥

तथा यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति है, वह भी सत् इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् ऐसे कहा जाता है ।

 
अश्रद्धया हुतं दत्तं मुद्रण ई-मेल
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥

हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी शुभ कर्म है – वह समस्त असत् इस प्रकार कहा जाता है, इसलिये वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही ।

 
ऊर्ध्वमूलमध: शाखमश्वतथं मुद्रण ई-मेल
श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमध: शाखमश्वतथं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १ ॥

श्री भगवान बोले – जिसके मूल (परमात्मा) उपर (उच्च, उन्नत) है, शाखाएँ नीचे (निम्न, अधम) हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गये हैं – उस पीपल (क्षणिक) वृक्ष को जो पुरुष तत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानेने वाला है ।

 
अधश्चोध्वँ प्रसृतास्तस्य शाखा मुद्रण ई-मेल
अधश्चोध्वँ प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥

(तीन) गुणोंसे व्याप्त होनेवाली और विषषों रुप कोंपलोंवाली उसकी (संसारवृक्षकी) शाखाएँ उपर – नीचे फैली हुई है; और कर्मबंधनमें डालनेवाले उसके मूल नीचे मनुष्यलोकमें फैले हुए हैं ।

 
न रुपमस्येह तथोपलभ्यते मुद्रण ई-मेल
न रुपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरुढमूल–
मसङगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं-
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृति: प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥

इस संसार वृक्ष का स्वरुप जैसा कहा है वैसा यहाँ (व्यवहारमें) नहीं पाया जाता । उसका न आदि है, न अंत, और न मध्य ! ऐसे मजबूत जडोंवाले संसाररुप पीपलवृक्षको दृढ़ वैराग्यरुप शस्त्रद्वारा काटकर –
तत्पश्चात् परमपदरुप परमेश्वरको भलीभाँति खोजना चाहिए, जहाँ गये हुए लोग फिर लौटकर संसारमें नहीं आते; और 'जिनसे इस पुरातन संसाररुप पीपलवृक्ष की प्रवृत्ति विस्तृत हुई है, ऐसे आदिपुरुष नारयण के शरण हूँ' इस प्रकार समजकर परमेश्वर का ध्यान करना चाहिये ।

 
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा मुद्रण ई-मेल
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसञ्ज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥

जिसे मान-मोह नष्ट हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिरुप दोष को जित लिया है, जिनकी आत्म स्वरुप में नित्य स्थिति होती है, कामनाओं से निवृत्ति हो गयी है वे सुख–दुःख नामक द्वन्द्वो से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं ।

 
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