| पाठमाला |
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"संस्कृत कठीन है, उसका व्याकरण अति कठीन है, संस्कृत केवल पंडितों और विद्वानों के लिए है, दार्शनिक चर्चा के लिए है....." अगर आप भी यह समजते रहे हैं, तो सुसंस्कृत का “पाठमाला” विभाग आपकी मान्यता को गलत साबित करने तत्पर है ! अगर तरीका गलत हो, तो सरलतम विषय कठिन बन जाता है, और सही हो तो कठीन विषय सरल । संस्कृत के बारे में कुछ ऐसा ही हुआ है ! व्याकरण के माध्यम से भाषा की सुरुआत करना क्या कभी रुचिकर हो सकता है ? हमारी मातृभाषा हमने व्याकरण के माध्यम से थोडे ही सीखी थी ? शक्य है, हमें अब भी मातृभाषा का व्याकरण न मालुम हो, पर इससे हमारा व्यावहारिक भाषा-ज्ञान कम तो नहीं हुआ ! ठीक इसी प्रकार संस्कृत का शिक्षण भी सुगम हो सकता है, यदि तरीका सही हो । संस्कृत का अभ्यास सरल बनाने का प्रयोग कुछ महानुभावोंने अर्वाचीन युग में किया, इनमें से एक हैं वेदमूर्ति पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकरजी । वैदिक एवं प्रचलित संस्कृत वाङ्मयके उपासक श्रीपाद सातवलेकरजी वैसे तो चित्रकार थे, पर कौटुंबिक संस्कारों ने उन्हें वैदिक संस्कृति के अभ्यास की ओर मोड दिया । कला और ज्ञान के विशिष्ट समन्वय द्वारा उन्होंने वैदिक ग्रंथों की सरल, मौलिक और विधायक रचनाएँ हिन्दी व प्राकृत भाषाओं को पुरस्कृत की । साथ ही सर्व-सामान्य इन्सान, संस्कृत से पराङ्मुख होने की वजाय उस में अभ्यास प्रवृत्त हो, इस लिए “संस्कृत स्वयं-शिक्षक” जैसी सरल शिक्षण प्रणालि का भी उन्होंने आविष्कार किया । उनके विशिष्ट परिश्रम का परिपाक यहाँ “पाठमाला” विभाग में प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है वाचकों की रुचि-वर्धन करने में यह प्रयत्न सार्थक होगा । यह विभाग स्वाध्याय मंडल (किल्ला पार्डी, वलसाड, गुजरात) की अनुमति से प्रकाशित किया गया है । पं. सातवलेकरजी की अन्य रचनाएँ एवं स्वाध्याय मंडल की प्रवृत्तियों के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखिए www.swadhyaymandal.org
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