गुणी च गुणरागी च विरलः सरलो जनः ।गुणवान हो, गुणानुरागी भी हो और सरल स्वभाव का भी हो एसा मानव मिलना दुर्लभ है ।
नमन्ति गुणिनो जनाः ।गुणी लोग विनम्र होते हैं ।
गुणवज्जनसंसर्गात् याति स्वल्पोऽपि गौरवम् ।गुणवान मानव के संसर्ग में आनेसे छोटा मानव भी गौरव प्राप्त करता है ।
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः ।गुणवान मानव गुण को समजता है, गुणहीन नहीं ।
गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ।मनुष्य के गुण का गुणीजन में हि आदर होता है ।
गुणं पृच्छ्स्व मा रूपम् ।गुण को पूछो रुप को नहीं ।
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः ।गुण की हि सब जगह पूजा होती है, पितृवंश तो निरर्थक है ।
गुणैरुत्तुड्गतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः ।गुण की वजह से, नहीं कि उँचे आसन पर बैठकर आदमी उँचा बनता है ।
शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः ।शरीर एक क्षण में नष्ट होता है, लेकिन गुण कल्पान्त तक स्थायी रहते है ।
वसन्ति हि प्रेम्णि गुणाः न वस्तुनि ।गुण प्रेम में रहता है वस्तु में नहीं ।
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