सुपुत्रः कुल्दीपकः ।उत्तम पुत्र कुल को दीप की भाँति प्रकाशित करता है ।
पुत्र्अगात्रस्य संस्पर्शः चन्दनादतिरिच्यते ।पुत्रके शरीर का स्पर्श चंदन के स्पर्श से भी ज़ादा सुखकारक है ।
अपुत्रता मनुष्याणां श्रेयसे न कुपुत्रता ।कुपुत्रता से अपुत्रता ज़ादा अच्छी है ।
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः ।जो पितृभक्त हो वही पुत्र है ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान न धार्मिकः ।जो विद्वान और धार्मिक न हो एसे पुत्र के उत्पन्न होने से क्या अर्थ ?
प्रीणाति यः सुचरितैः पितरौ स पुत्रः ।जो अच्छे कृत्यों से मातापिता को खुश करता है वही पुत्र है ।
पुत्रस्नेहस्तु बलवान् ।पुत्रस्नेह बलवान होता है ।
पुत्रस्पर्शात् सुखतरः स्पर्शो लोके न विद्यते ।पुत्र के स्पर्श से ज़ादा सुखकारक अन्य कोई स्पर्श दुनिया में नहीं है ।
अनपत्यता एकपुत्रत्वं इत्याहुर्धर्मवादिनः ।एक पुत्रवाला मानव अनपत्य अर्थात् निःसंतान समान होता है एसा धर्मवादि कहते हैं ।
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