किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ।पांडित्य क्या है ? भले-बुरे का विवेक ।
विद्वानेव विजानाति विद्वज्जन परिश्रमम् ।विद्वान के परिश्रम को विद्वान हि जानता है ।
विद्वान सर्वत्र पूज्यते ।विद्वान सब जगह सन्मान पाता है ।
यः क्रियावान् स पण्डितः ।विद्वत्ता के साथ साथ जो क्रियावान है वही पंडित है ।
सकृत् जल्पन्ति पण्डिताः ।पंडित कोई भी बात एक हि बार बोलता है ।
सारं गृहणन्ति पण्डिताः ।पंडित (वस्तु नहीं पर) वस्तु का सार ग्रहण करते हैं ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ।जो सब प्राणी को स्वयं की भाँति (आत्मवत्) देखता है वही पंडित है ।
विदुषां किमशोभनम् ।पण्डित को कोई बात अशोभनीय नहीं होती ।
पण्डितो बन्धमोक्षवित् ।जो बंधन और मोक्ष को समझता है वही पंडित है।
दिष्टे न व्यधते बुधः ।अवश्यंभावी मुसीबत में पंडित व्यथित नहीं होते ।
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