विषमां हि गतिं प्राप्य दैवं गर्हयते नरः ।विषम गति को प्राप्त होते मानव अपने “नसीब” की निंदा करते हैं ।
ज्ञात्वापि दोषमेव करोति लोकः ।दोष को जानकर भी लोग दोष हि करते हैं ।
सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं निरूपद्रवम् ।सभी लोग अपने आप को अच्छे समझते हैं ।
गतानुगतिको लोकः न लोक़ः पारमार्थिकः ।लोग देख-देखकर काम करते हैं, वास्तविकता की जाँच नहीं करते ।
को लोकमाराधयितुं समर्थः ।सभी को कौन खुश कर सकता है ?
चिरनिरूपणीयो हि व्यक्तिस्वभावः ।व्यक्ति का स्वभाव बहुत समय के बाद पहचाना जाता है ।
अनपेक्ष्य गुणागुणौ जनः स्वरूचिं निश्र्चयतोऽनुधावति।लोग गुण और अवगुण को ध्यान में लिए बिना अपनी रुचि से काम करतते हैं ।
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