प्रेम
मिन्नश्र्लिष्टा तु या मुद्रण ई-मेल

मिन्नश्र्लिष्टा तु या प्रीतिः न सा स्नेहेन वर्धते ।
जो प्रीति एक बार तूट्ने के बाद जूडती है वह स्नेह से नहीं बढती ।

 
दुःखं त्यक्तुं मुद्रण ई-मेल

दुःखं त्यक्तुं बध्दमूलोऽनुरागः ।
बंधन का मूल – ऐसे प्रेम को छोडना बहुत कठिन है ।

 
किमशकनीयं प्रेम्णः मुद्रण ई-मेल

किमशकनीयं प्रेम्णः ।
प्रेम को क्या अशक्य है ?

 
प्रेम पश्यति मुद्रण ई-मेल

प्रेम पश्यति भयान्यपदेऽपि ।
प्रेम को भयरहित स्थान पर भी भय लगता है ।

 
बन्धनानि किल सन्ति मुद्रण ई-मेल

बन्धनानि किल सन्ति बहूनि ।
प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत् ।।
बंधन कई प्रकार के होते हैं लेकिन प्रेम्ररुपी धागे से जो बंधन होता है वह तो कोई विशेष प्रकार का है ।

 
वसन्ति हि प्रेम्णि मुद्रण ई-मेल

वसन्ति हि प्रेम्णि गुणाः न वस्तुषु ।
प्रेम में गुण निवास करते हैं, वस्तु में नहीं ।

 
न खलु बहिरुपाधीन मुद्रण ई-मेल

न खलु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते ।
बाह्य उपाधि के ज़रीये प्रेम नहीं होता ।

 
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं मुद्रण ई-मेल

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं मूकास्वादनवत् ।
गुंगे मानव के आस्वाद की तरह प्रेम का स्वरुप अनिर्वचनीय है ।

 
अकृत्रिमसुखं प्रेम मुद्रण ई-मेल

अकृत्रिमसुखं प्रेम ।
प्रेम अकृत्रिम सुख है ।

 



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