सुखदुःख
न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह मुद्रण ई-मेल

न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः ।
कुसंप से मानवको सुख प्राप्त नहीं होता ।

 
लोभं हित्वा सुखी भवेत् मुद्रण ई-मेल

लोभं हित्वा सुखी भवेत् ।
लोभ त्याग ने से मानव सुखी बनता है ।

 
दुःखितस्य निशा कल्पः मुद्रण ई-मेल

दुःखितस्य निशा कल्पः सुखितस्यैव च क्षणः ।
दुःखी मानव को रात्रि, ब्रह्मदेवके कल्प जितनी लंबी लगती है; लेकिन सुखी मानव को क्षण जितनी छोटी लगती है ।

 
न नित्यं लभते दुःखं मुद्रण ई-मेल

न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ।
किसी को सदैव दुःख नहीं मिलता या सदैव सुख भी लाभ नहीं होता ।

 
हान् भवत्यनिर्विण्णः मुद्रण ई-मेल

हान् भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानन्त्यमश्नुते ।
सतत उद्योग करनेवाला मानव हि महान बनता है और अक्षय सुख प्राप्त करता है ।

 
आत्मदोषैर्नियच्छन्ति मुद्रण ई-मेल

आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे सुखदुखे जनाः ।
सब को अपने कर्मानुसार सुख्दुःख भुगतने पडते है ।

 
दुःखादुद्विजते जन्तुः मुद्रण ई-मेल

दुःखादुद्विजते जन्तुः सुखं सर्वाय रुच्यते ।
दुःख से मानव थक जाता है, सुख सबको भाता है ।

 
अनर्थाः संघचारिणः मुद्रण ई-मेल

अनर्थाः संघचारिणः ।
मुश्किलें समुह में हि आती है ।

 



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