खलानां चरित्रे खला एव विज्ञाः ।दुष्ट के चरित्र को दुष्ट हि समजता है ।
खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फ़लति साधुषु ।दुर्जन पाप करता है और उसका फ़ल अच्छे लोगों को भुगतना पडता है ।
खलः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति ।दुष्ट मानव दूसरे के राई जितने दुर्गुण को भी देखता है ।
प्रारम्भते न खलु विध्नभयेन नीचैः ।विध्न-बाधा के भय से नीच मानव कार्य हि आरंभ नहीं करते ।
नीचाः कलहमिच्छन्ति ।नीच मानव झगडे चाहता है ।
दुर्जनः परिहर्तव्यः विद्ययाऽलंकृतोऽपि सन् ।विद्या से अलंकृत हो फ़िर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए ।
सर्पो दशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे ।सर्प तो समय आने पर डँसता है पर दुर्जन तो कदम कदम पर काटता है ।
सर्वांगे दुर्जनो विषम् ।दुर्जन के हर एक अंग में विष होता है ।
दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्र्वासकारणम् ! दुर्जन मानव का प्रियवादी होना यह उस पर विश्वास रखने का कारण नहीं है ।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कार्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ।दुष्ट लोगों के मन में एक, वाणी में दूसरा और कर्म तीसरा हि होता है ।
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