उद्योगसम्पन्नं समुपैति लक्ष्मीः ।उद्योग-संपन्न मानव के पास लक्ष्मी आती है ।
पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यसि ।पुरुषार्थ बिना दैव सिद्ध नहीं होता ।
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ।यत्न करने के बावजुद यदि कार्य सिद्ध न हो तो उसमें मानव का क्या दोष ?
यत्नवान् सुखमेधते ।प्रयत्नशील मानव सुख पाता है ।
धिग् जन्म यत्नरहितम् ।प्रयत्नरहित जन्म को धिक्कार है ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या ।दैव का विचार किये बगैर अपनी शक्ति अनुसार प्रयत्न करो ।
पुरुषकारमनुवर्तते दैवम् ।दैव पौरुषका अनुसरण करता है ।
कृतं मे दक्षिणे हस्ते नयो मे सव्य आहितः ।
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