कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।विद्यार्थीको सुख कहाँ ?
विद्यारत्नं महधनम् ।विद्यारूपी रत्न सब से बडा धन है ।
विद्या ददाति विनयम् ।विद्या से मानव विनयी बनता है ।
सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदरपूरणे ।यदि सद्विद्या पास हो तो बेचारे उदर के भरण-पोषण की चिंता कहाँ से हो ?
विद्या रूपं कुरूपाणाम् ।कुरूप मानव के लिए विद्या हि रूप है ।
विद्या मित्रं प्रवासेषु ।प्रवास में विद्या मित्र की कमी पूरी करती है ।
किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।कल्पलता की तरह विद्या कौन सा काम नहीं सिध्ध कर देती ?
सा विद्या या विमुक्तये ।मनुष्य को मुक्ति दिलाये वही विद्या है ।
विद्या योगेन रक्ष्यते ।विद्या का रक्षण अभ्यास से होता है ।
अशुश्रूषा त्वरा श्र्लाधा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ।गुरुकी शुश्रूषा न करना, पढने में शीघ्र न होना और खुद की प्रशंसा करना – ये तीन विद्या के शत्रु है ।
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