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धनेन किं यन्न
धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते ।
जिसका दान न किया जाय और जो भुगता न जाय उस धन का क्या उपयोग ?
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यावत् वित्तोपार्जनसक्तः
यावत् वित्तोपार्जनसक्तः तावत् निजपरिवरो रक्तः ।
जब तक आदमी धन कमाने में समर्थ हो तब तक हि उसके परिवारवाले उस से प्रसन्न रहते हैं ।
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धनं यस्य कुलं तस्य
धनं यस्य कुलं तस्य बुध्दिस्तस्य स पण्डितः ।
जिसके पास धन है वही कुलवान, बिद्धिमान और पंडित माना जाता है ।
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मित्राण्यमित्रतां यान्ति
मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः ।
जिसके पास धन नहीं है उसके मित्र भी अमित्र बनते है ।
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सुखस्य मूलं
सुखस्य मूलं धर्मः । ध्रर्मस्य मूलमर्थः ।
सुख का मूल धर्म है । धर्म का मूल अर्थ है
।
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नाधनस्यास्त्ययं लोको
नाधनस्यास्त्ययं लोको न परस्य कथंचन ।
धनहीन व्यक्ति के लिए नतो इस लोक न तो परलोक सुखकारक होता है ।
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अर्थस्यावयवावेत्तौ
अर्थस्यावयवावेत्तौ धर्मकामाविति श्रुतिः ।
वेद कहते हैं कि धर्म और काम यह अर्थ के अवयव है ।
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यस्यार्थास्त्स्य मित्राणि
यस्यार्थास्त्स्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
जिसके पास पैसा है उसी के मित्र और सगे संबंधी होते हैं ।
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संभावितस्य चाकीर्ति
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ।
सम्मानित व्यक्ति को अपयश मरण से भी ज़ादा कष्टदायक लगता है ।
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