कर्म
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः मुद्रण ई-मेल
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥

जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हो, कर्तापन के अभिमान से रहित किया गया हो, और फलेच्छा बिना, राग-द्वेष रहित किया गया हो - वह कर्म सात्त्विक कहा गया है ।

 
यज्ञदानतपःकर्म न मुद्रण ई-मेल
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

यज्ञ, दान और तपरुपी कर्म त्याग करने योग्य नहि है, बल्कि ये तो अवश्य करने चाहिए; क्यों कि यज्ञ, दान, और तप - ये तीनों कर्म बुद्धिमान मनुष्य को पावन करनेवाले हैं ।

 
रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः मुद्रण ई-मेल
रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगाः
निरालम्बो मार्गश्चरणरहितः सारथिरपि ।
रविर्गच्छत्यन्तं प्रतिदिनमपारस्य नभसः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥

सूर्य के रथ को एक ही पैया है, साँप की लगाम से संयमित किये हुए सात घोडे हैं, आलंबनरहित मार्ग है, बिना पैर का सारथि अरुण है; साधनों की इतनी मर्यादा होने पर भी सूर्य रोज सारे आकाश में घूमता है, क्यों कि महापुरुषों की कार्यसिद्धि, (व्यक्ति के) सत्त्व पर निर्भर करती है, न कि साधनों पर ।

 
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि मुद्रण ई-मेल
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

जो आसक्तिरहित और ब्रह्मार्पण वृत्ति से कर्म करते हैं, वे पानी से अलिप्त रहनेवाले कमल की तरह पाप से अलिप्त रहते हैं ।

 
कर्मण्यकोविदाः स्तब्धा मुद्रण ई-मेल
कर्मण्यकोविदाः स्तब्धा मूर्खाः पण्डितमानिनः ।
वदन्ति चाटुकान मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः ॥

उनको कर्म का रहस्य मालुम नहीं; मूर्ख होने पर भी वे अपने आप को पंडित मानते हैं, और अभिमान में अकडे रहते हैं । वे मीठी बातें भूल जाते हैं, और केवल वस्तुशून्य शब्द माधुरी के मोह में पडकर चटकीली-भडकीली बातें करते रहते हैं ।

 
केचित् कुर्वन्ति कर्माणि मुद्रण ई-मेल
केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामरहतचेतसः ।
त्यजन्तः प्रकृयिदैवीर्यथाहं लोकसंग्रहम् ॥

जगत में विरल हि लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान की माया से निर्मित विषयसंबंधी वासनाओं का त्याग करके मेरे समान केवल लोकसंग्रह के लिए कर्म करते रहेते हैं ।

 
अपहाय निजं कर्म मुद्रण ई-मेल
अपहाय निजं कर्म कृष्णकृष्णोति वादिनः ।
ते हरेर्द्वेषिनः पापाः धर्मार्थ जन्म यध्धरेः ॥

जो लोग अपना कर्म छोडकर केवल कृष्ण कृष्ण बोलते रहते हैं, वे हरि के द्वेषी हैं ।

 
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