पुनः प्रभातं पुनरेव शर्वरी मुद्रण
पुनः प्रभातं पुनरेव शर्वरी
पुनः शशांकः पुनरुद्यते रविः ।
कालस्य किं गच्छति याति यौवनं
तथापि लोकः कथितं न बुध्यते ॥

फिर से प्रभात, फिर से रात्रि, फिर से चंद्र, और फिर से सूरज का उगना ! काल का क्या जाता है ? कुछ नहीं; यह तो यौवन जाता है, (पर) लोग कहाँ समज़ते हैं ?