कालः समाविषमकरः परिभवसंमानकारकः कालः । बालः करोति पुरुषं दातारं या चितारं च ॥
काल सम और विषम करनेवाला, अपमान और सन्मान करनेवाला है; काल हि मनुष्य को दातार और भिक्षुक बनाता है ।
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स्वमस्तकमारूढं मृत्युं पश्येज्जनो यदि । आहारोऽपि न रोचते किमुतान्या विभूतयः ॥
यदि मानव अपने मस्तक पर सवार मृत्यु को देखें, तो उसको खाना भी नहीं रुचता, तो फिर दूसरों की संपत्ति का तो क्या पूछना ?
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बलिनो मृत्युसिंहस्य संसारवनचारिणः । शृण्वन् व्याधिजरानादान् कथं तिष्डसि निर्भयः ॥
संसाररुप वन में घूमते, बलवान मृत्युरुप सिंह की व्याधि- जरा रुप गर्जनाएँ सुनकर भी, अब तक तू निर्भय कैसे खडा है ?
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यथा व्यालगलस्थोऽपि भेको दर्शानपेक्षते । तथा कालहिना ग्रस्तो लोको भोगानशाश्वतान् ॥
जैसे साँप के मुख में रहा रहा मेण्डक धाव की अपेक्षा रखता है, वैसे कालरुप सर्प से ग्रस्त मानव, अशाश्वत भोग इच्छता है ।
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इदमद्य करिष्यामि श्वः कर्तास्मि इति वादिनम् । कालो हरति संप्राप्तो नदीवेग इव द्रुमम् ॥
जैसे नदी का वेग पेड को ले जाता है, वैसे आ पहुँचा काल, "आज यह करूँगा, कल वह करूँगा" ऐसा बोलनेवाले को ले जाता है ।
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किं श्रिया किं कामेन किमीहितैः । दिनैः कतिपयैरेव कालः सर्वं निकृन्तति ॥
लक्ष्मी, राज्य, कामना, ये सब किस काम के ? थोडे हि समय में काल सब फाड खायेगा !
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म्रियमाणं मृतं बन्धुं शोचन्ते परिदेविनः । आत्मनं नानुशोचन्ति कालेन कवलीकृतम् ॥
शोक करनेवालें, मरनेवाले या मरे हुए बंधु का शोक करते हैं; लेकिन काल का निवाला बने हुए, अपने लिए शोक नहीं करते (कर सकते) !
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पुनः प्रभातं पुनरेव शर्वरी पुनः शशांकः पुनरुद्यते रविः । कालस्य किं गच्छति याति यौवनं तथापि लोकः कथितं न बुध्यते ॥
फिर से प्रभात, फिर से रात्रि, फिर से चंद्र, और फिर से सूरज का उगना ! काल का क्या जाता है ? कुछ नहीं; यह तो यौवन जाता है, (पर) लोग कहाँ समज़ते हैं ?
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