संतोष
अकृत्वा परसन्तापं अगत्वा मुद्रण ई-मेल
अकृत्वा परसन्तापं अगत्वा खलमन्दिरम् ।
अक्लेशयित्वा चात्मानं यदल्पमपि तद्भहु ॥

अन्य को संताप दिये बगैर, खलपुरुष के घर गये बगैर (लाचारी किये बगैर) और स्वयं को अति कष्ट दिये बगैर जो थोडा भी मिले उसे काफी समज लेना चाहिए ।

 
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं मुद्रण ई-मेल
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धाना-मितश्चेतश्च धावताम् ॥

जो सुख शांतचित्त लोगों को अमृतस्वरुप संतोष से मिलता है, वह धनलोलुप यहाँ वहाँ भागनेवालों को कहाँ ?

 
सन्तोषः परमं सौख्यं मुद्रण ई-मेल
सन्तोषः परमं सौख्यं सन्तोषः परममृतम् ।
सन्तोषः परमं पथ्यं सन्तोषः परमं हितम् ॥

संतोष, यह परम् सौख्य, परम् अमृत, परम् पथ्य और परम् हितकारक है ।

 
सौमित्रि र्वदति विभीषणाय मुद्रण ई-मेल
सौमित्रि र्वदति विभीषणाय लङ्काम्
देहि त्वं भुवनपते विनैव कोशम् ।
एतस्मिन् रघुपति राह वाक्यमेतत्
विक्रीते करिणि किमङ्कुशे विवादः ॥

लक्ष्मण कहते है, "हे भुवनपति ! बिभीषण को बिना खजाने की लंका दीजिए", तब रघुपति यह वाक्य बोले, "हाथी को बेचने के बाद अंकुश के बारे में विवाद क्या करना ?"

 
क्रोधो वैवस्वतो राजा मुद्रण ई-मेल
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।
विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥

क्रोध यमराज है, तृष्णा वैतरणी (यमलोक की नदी) नदी है, और संतोष नंदनवन है ।

 
आशैव राक्षसी पुंसामाशैव मुद्रण ई-मेल
आशैव राक्षसी पुंसामाशैव विषमञ्जरी ।
आशैव जीर्णमदिरा नैराश्यं परमं सुखम् ॥

इन्सान के लिए आशा हि राक्षसी, विष लता, और जीर्ण मदिरा है । आशारहितता परम् सुख है ।

 
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गः तृणं मुद्रण ई-मेल
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गः तृणं शूरस्य जीवनम् ।
जिताक्षस्य तृणं नारी निस्पृहस्य तृणं जगत् ॥

उदार पुरुष को धन, शूर को मृत्यु, विरक्त को नारी, और निस्पृही को जगत तिन्के समान है ।

 
तुष्टो हि राजा यदि सेवकेभ्यो मुद्रण ई-मेल
तुष्टो हि राजा यदि सेवकेभ्यो
भाग्यात् परं नैव ददाति किञ्चित् ।
अहर्निशं वर्षति वारिवाहः
तथापि पत्रत्रितयः पलाशः ॥

यदि राजा सेवकों पर खुश हो फिर भी उनके भाग्य से ज़ादा वह उन्हें कुछ नहि दे सकता । बादल रात-दिन बरसे तो भी पलाश को तो तीन पत्ते हि होते हैं !

 
सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः मुद्रण ई-मेल
सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥

संतोष परम् बल है, सत्संग परम् गति है, विचार परम् ज्ञान है, और शम परम् सुख है ।

 
सर्पाः पिबन्ति पवनं मुद्रण ई-मेल
सर्पाः पिबन्ति पवनं न च दुर्बलास्ते
शुष्कैस्तृणैः वनगजा बलिनो भवन्ति ।
रुक्षाशनेन मुनयः क्षपयन्ति कालम्
सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम् ॥

सर्प पवन पीकर भी दुर्बल नहि है, जंगली हाथी सूखा घास खाकर भी बलवान बनते हैं, मुनि रुखा खुराक खाकर जिंदगी निकालते हैं । संतोष हि मनुष्य का परम् खजाना है ।

 
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