बाल्यादपि चरेत् धर्ममनित्यं मुद्रण ई-मेल
बाल्यादपि चरेत् धर्ममनित्यं खलु जीवितम् ।
फलानामिव पक्कानां शश्वत् पतनतो भयम् ॥

बचपन से हि धर्म का आचरण करना (उचित है), जीवन अनित्य है । (शरीर को) पके हुए फल की तरह गिरने का सदैव भय होता है ।

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