धर्म
यावत्स्वस्थमिदं देहं मुद्रण ई-मेल
यावत्स्वस्थमिदं देहं यावन्मृत्युश्च दूरतः ।
तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति ॥

जब तक शरीर स्वस्थ है और मृत्यु दूर है, तब तक आत्महित कर लेना चाहिए । मृत्यु नजदीक आने पर क्या करोगे ?

 
अनित्यानि शरीराणि मुद्रण ई-मेल
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्य संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसङ्ग्रहः ॥

शरीर अनित्य है; धन भी कायमी नहि है; और मृत्यु निश्चित है, इस लिए धर्मसंग्रह करना चाहिए ।

 
सकलापि कला कलावतां मुद्रण ई-मेल
सकलापि कला कलावतां विकला धर्मकलां विना खलु ।
सकले नयने वृथा यथा तनुभाजां कनीनिकां विना ॥

जैसे इन्सान की आँखें कीकी के बिना निस्तेज है, वैसे हि धर्म की कला के बिना सभी कला व्यर्थ है ।

 
मृतं शरीरमुत्सृज्य मुद्रण ई-मेल
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥

मृत शरीर को छोडकर जैसे लकडे के टुकडे चले जाते हैं, वैसे संबंधी भी मुँह फेरकर चले जाते हैं । केवल धर्म हि उसके पीछे जाता है ।

 
एक एव सुह्रद् धर्मो मुद्रण ई-मेल
एक एव सुह्रद् धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत् हि गच्छति ॥

मरने के बाद भी जो पीछे पीछे आता है, वह एक धर्म ही केवल मित्र है । बाकी सब तो शरीर के साथ हि नष्ट होता है ।

 
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