धर्म
सत्यसमार्जवमक्रोधमनसूयां मुद्रण ई-मेल
सत्यसमार्जवमक्रोधमनसूयां दमं तपः ।
अहिंसा चानृशंस्यं च क्षमां चैवानुपालय ॥

सत्य, सरलता, अक्रोध, अनसूया, दम, तप, अहिंसा, कोमलता, क्षमा – इन सब का पालन कर ।

 
धर्मस्य तस्य लिङ्गानि मुद्रण ई-मेल
धर्मस्य तस्य लिङ्गानि दया क्षान्तिरहिंसनम् ।
तपो दानं च शीलं च सत्यं शौचं वितृष्णता ॥

दया, क्षमा, अहिंसा, तप, दान, शील, सत्य, शौच, तृष्णा का अभाव – ये सब धर्म के चिह्न हैं ।

 
अध्रुवेण शरीरेण मुद्रण ई-मेल
अध्रुवेण शरीरेण प्रतिक्षण विनाशिना ।
ध्रुवं यो नार्जयेत् धर्मं स शोच्यः मूढचेतनः ॥

प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले, अनिश्चित शरीर के मुकाबले, निश्चित ऐसे धर्म को जो प्राप्त नहि करता, वह मूर्ख शोक करने योग्य है ।

 
विद्या रुपं धनं शौर्यं मुद्रण ई-मेल
विद्या रुपं धनं शौर्यं कुलीनत्वमरोगता ।
राज्यं स्वर्गश्च मोक्षश्च सर्वं धर्मादवाप्यते ॥

विद्या, रुप, धन, शौर्य, कुलीनता, स्वस्थ शरीर, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष – ये सब धर्म से पाये जा सकते हैं ।

 
पूर्वे वयसि तत्कुर्याधेन मुद्रण ई-मेल
पूर्वे वयसि तत्कुर्याधेन वृद्धः सुखं वसेत् ।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येनामुत्रसुखं वसेत् ॥

युवानी में ऐसा करना जिससे बूढापा सुख से कटे । यह जीवन ऐसे जीना जिससे परलोक (या दूसरे जन्म) में चैन मिले ।

 
यौवनं जीवितं चित्तं मुद्रण ई-मेल
यौवनं जीवितं चित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥

यौवन, जीवन, चित्त, छाया, लक्ष्मी और सत्ता – ये छे चंचल है, ऐसा समजकर धर्मरत रहेना चाहिए ।

 
अस्थिरं जीवितं लोके मुद्रण ई-मेल
अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने ।
अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्ति र्द्वयं स्थिरम् ॥

इस जगत में धन, जीवन, यौवन अस्थिर हैं; पुत्र और स्त्री भी अस्थिर हैं । केवल धर्म और कीर्ति (ये दो हि) स्थिर है ।

 
उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं मुद्रण ई-मेल
उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृतम् ।
आयुषः खण्डमादाय रविरस्तं गमिष्यति ॥

रोज उठकर "आज क्या सुकृत्य किया" यह जान लेना चाहिए, क्यों कि सूर्य (हररोज) आयुष्य का छोटा तुकडा लेकर अस्त होता है ।

 
अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं मुद्रण ई-मेल
अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् ।
गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥

बूढापा और मृत्यु नहीं आयेंगे ऐसा समजकर विद्या और धन का चिंतन करना चाहिए । पर मृत्यु ने हमें बाल से जकड रखा है, ऐसा समजकर धर्म का आचरण करना चाहिए ।

 
जीवन्तं मृतवन्मन्ये मुद्रण ई-मेल
जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् ।
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥

धर्महीन मनुष्य को जिंदा होने के बावजुद मैं मृत समजता हूँ । धर्मयुक्त इन्सान मर कर भी दीर्घायु रहेता है उस में संदेह नहीं ।

 
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