धर्म
आहार निद्रा भय मैथुनं च मुद्रण ई-मेल
आहार निद्रा भय मैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष:
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये तो इन्सान और पशु में समान है । इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है ।

 
धर्मस्य फलमिच्छन्ति मुद्रण ई-मेल
धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः ।
फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥

लोगों को धर्म का फल चाहिए, पर धर्म का आचरण नहि ! और पाप का फल नहि चाहिए, पर गर्व से पापाचरण करना है !

 
सत्येनोत्पद्यते धर्मो मुद्रण ई-मेल
सत्येनोत्पद्यते धर्मो दयादानेन वर्धते ।
क्षमायां स्थाप्यते धर्मो क्रोधलोभा द्विनश्यति ॥

धर्म सत्य से उत्पन्न होता है, दया और दान से बढता है, क्षमा से स्थिर होता है, और क्रोध एवं लोभ से नष्ट होता है ।

 
धर्मो मातेव पुष्णानि मुद्रण ई-मेल
धर्मो मातेव पुष्णानि धर्मः पाति पितेव च ।
धर्मः सखेव प्रीणाति धर्मः स्निह्यति बन्धुवत् ॥

धर्म माता की तरह हमें पुष्ट करता है, पिता की तरह हमारा रक्षण करता है, मित्र की तरह खुशी देता है, और संबंधीयों की भाँति स्नेह देता है ।

 
अन्यस्थाने कृतं पापं मुद्रण ई-मेल
अन्यस्थाने कृतं पापं धर्मस्थाने विमुच्यते ।
धर्मस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥

अन्य जगहों पे किये हुए पापों से धर्मस्थान में मुक्ति मिलती है, पर धर्मस्थान में किया हुआ पाप वज्रलेप बनता है ।

 
न क्लेशेन विना द्रव्यं मुद्रण ई-मेल
न क्लेशेन विना द्रव्यं विना द्रव्येण न क्रिया ।
क्रियाहीने न धर्मः स्यात् धर्महीने कुतः सुखम् ॥

क्लेश बिना द्रव्य नहि, द्रव्य बिना क्रिया नहि, क्रिया बिना धर्म संभव नहि; और धर्म के बिना सुख कैसे हो सकता है ? (अर्थात् क्लेशरहित तो धर्म और सुख भी नहि मिल सकते !)

 
न पुत्रात् परमो लाभो मुद्रण ई-मेल
न पुत्रात् परमो लाभो न भार्यायाः परं सुखम् ।
धर्मात् परमं मित्रं नातृतात् पातकं परम् ॥

पुत्र याने परम् लाभ, पत्नी याने परम् सुख, धर्म याने परम् मित्र, और असत्य याने परम् पातक है ।

 
यथा यथा हि पुरुषः मुद्रण ई-मेल
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः ।
तथा तथाऽस्य सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ॥

जैसे जैसे इन्सान कल्याण में चित्त एकाग्र करे, वैसे वैसे उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, उसमें संशय नहि ।

 
इज्याध्ययनदानानि तपः मुद्रण ई-मेल
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्ठविधः स्मृतः ॥

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दम, अलोभ – ऐसा आठ प्रकार का धर्ममार्ग कहा गया है ।

 
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं मुद्रण ई-मेल
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच मिन्द्रियनिग्रहः ।
धी र्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ॥

धारणा शक्ति, क्षमा, दम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध – ये दस धर्म के लक्षण हैं ।

 
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