धर्म
चला लक्ष्मीः चलाः प्राणाः मुद्रण ई-मेल
चला लक्ष्मीः चलाः प्राणाः चले जीवितमन्दिरे ।
चलाचले च संसारे धर्मो एको हि निश्चलः ॥

लक्ष्मी, प्राण, जीवन (सब) चंचल है । इस अस्थिर संसार में केवल धर्म हि निश्चल है ।

 
स धर्मो यो दयायुक्तः मुद्रण ई-मेल
स धर्मो यो दयायुक्तः सर्वप्राणिहितप्रदः ।
स एवोत्तारेण शक्तो भवाम्भोधेः सुदुस्तरात् ॥

जो दयायुक्त और सब प्राणियों का हित करनेवाला हो वही धर्म है । वैसा धर्म ही सुदुस्तर भवसागर से पार ले जाने में शक्तिमान है ।

 
धर्मेण हन्यते व्याधिः मुद्रण ई-मेल
धर्मेण हन्यते व्याधिः हन्यन्ते वै तथा ग्रहाः ।
धर्मेण हन्यते शत्रुः यतो धर्मस्ततो जयः ॥

धर्म से व्याधि दूर होता है, ग्रहों का हरण होता है, शत्रु का नाश होता है । जहाँ धर्म है, वहीं जय है ।

 
प्रथमे नार्जिता विद्या मुद्रण ई-मेल
प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम् ।
तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति ॥

जीवन के प्रथम (आश्रम) में जिसने विद्या न पायी, दूसरे में धन नहि पाया, तीसरे में पुण्य नहि पाया, वह चौथे में क्या करेगा ?

 
यावत्स्वस्थमिदं कलेवर गृहं मुद्रण ई-मेल
यावत्स्वस्थमिदं कलेवर गृहं यावज्जरा दूरतः
यावच्चेन्द्रिय शक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः ।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्
संदीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥

जब तक शरीररुप घर स्वस्थ है और बूढापा दूर है, इंद्रियों की शक्ति खत्म नहि हुई, आयुष्य का क्षय नहि हुआ, तब तक में बुद्धिमान इन्सान ने आत्मकल्याण के लिए महान प्रयत्न करना चाहिए । घर को आग लगने के बाद कूआ खोदने का क्या मतलब ?

 
विद्या मित्रं प्रवासे च मुद्रण ई-मेल
विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च ।
रोगिणश्चौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥

प्रवास में मित्र विद्या, घर में मित्र पत्नी, रोगी का मित्र औषध, और मृत का मित्र धर्म है ।

 
धर्मः कल्पतरुः मणिः विषहरः मुद्रण ई-मेल
धर्मः कल्पतरुः मणिः विषहरः रत्नं च चिन्तामणिः
धर्मः कामदुधा सदा सुखकरी संजीवनी चौषधीः ।
धर्मः कामघटः च कल्पलतिका विद्याकलानां खनिः
प्रेम्णैनं परमेण पालय ह्रदा नो चेत् वृथा जीवनम् ॥

धर्म कल्पतरु, विषहर मणि, चिंतामणि रत्न है । धर्म सदा सुख देनेवाली कामधेनु है, और संजीवनी औषधि है । धर्म कामघट, कल्पलता, विद्या और कला का खजाना है । इस लिए, तूं उस धर्म का प्रेम और आनंद से पालन कर, वर्ना तेरा जीवन व्यर्थ है ।

 
नागो भाति मदेन कं जलरुहैः मुद्रण ई-मेल
नागो भाति मदेन कं जलरुहैः पूर्णेन्दुना शर्वरी
वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनै र्नद्यः सभा पण्डितैः ।
शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवै र्मन्दिरम्
सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं धार्मिकैः ॥

हाथी मद से, पानी कमल से, रात्रि पूर्ण चाँद से, वाणी व्याकरण से, नदियाँ हंस और हंसीयों से, सभा पंडितों से, प्रमदा शील से, घोडा वेग से, मंदिर नित्य उत्सवों से, कुल सत्पुत्र से, और पृथ्वी राजा से शोभायमान होती है । वैसे तीनों लोक धार्मिक लोगों से सुशोभित है ।

 
यः प्राप्य मानुषं जन्म मुद्रण ई-मेल
यः प्राप्य मानुषं जन्म दुर्लभं भवकोटिभिः ।
धर्मं शर्मकरं कुर्यात् सफलं तस्य जीवितम् ॥

जो इन्सान करोडों जन्मों के बाद मिला हुआ मनुष्य जन्म प्राप्त करके, कल्याणकारी धर्म करे उसका जीवन सफल है ।

 
दीपो यथाल्पोऽपि तमांसि मुद्रण ई-मेल
दीपो यथाल्पोऽपि तमांसि हन्ति
लवोऽपि रोगान् हरते सुधायाः ।
तृणं दहत्याशु कणोऽपि चाग्नेः
धर्मस्य लेशोऽप्यमलः तथां हः ॥

दिया छोटा हो तो भी अंधकार दूर करता है, अमृत की एकाध बूँद रोगों का निवारण करती है, अग्नि का तिन्का घास को जला देता है । वैसे हि लेशमात्र धर्म भी पाप को जला देता है ।

 
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