तर्कविहीनो वैद्यः लक्षण हीनश्च पण्डितो लोके । भावविहीनो धर्मो नूनं हस्यन्ते त्रीण्यपि ॥
तर्कविहीन वैद्य, लक्षणविहीन पंडित, और भावरहित धर्म - ये अवश्य हि जगत में हाँसीपात्र बनते हैं ।
अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने । अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥
इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है । केवल धर्म, और कीर्ति ये दो हि बातें स्थिर है ।
स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य जीवति । गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् ॥
जो गुणवान है, धार्मिक है वही जीते हैं (या "जीये" कहे जाते हैं) । जो गुण और धर्म से रहित है उसका जीवन निष्फल है ।
प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु साधनानामनेकता । उपास्यानामनियमः एतद् धर्मस्य लक्षणम् ॥
वेदों में प्रामाण्यबुद्धि, साधना के स्वरुप में विविधता, और उपास्यरुप संबंध में नियमन नहीं - ये हि धर्म के लक्षण हैं ।
अविज्ञाय नरो धर्मं दुःखमायाति याति च । मनुष्य जन्म साफल्यं केवलं धर्मसाधनम् ॥
धर्म को न जानकर मनुष्य दुःखी होता है । धर्म का सेवन करने में हि मनुष्य जन्म का साफल्य है ।
बाल्यादपि चरेत् धर्ममनित्यं खलु जीवितम् । फलानामिव पक्कानां शश्वत् पतनतो भयम् ॥
बचपन से हि धर्म का आचरण करना (उचित है), जीवन अनित्य है । (शरीर को) पके हुए फल की तरह गिरने का सदैव भय होता है ।
विलम्बो नैव कर्तव्यः आयुर्याति दिने दिने । न करोति यमः क्षान्तिं धर्मस्य त्वरिता गतिः ॥
विलंब करना ठीक नहि । दिन ब दिन आयुष्य कम होता है । यमराज रुकेंगे नहि, धर्म की (काल की) गति त्वरित है ।
धर्मस्य दुर्लभो ज्ञाता सम्यक् वक्ता ततोऽपि च । श्रोता ततोऽपि श्रद्धावान् कर्ता कोऽपि ततः सुधीः ॥
धर्म को जाननेवाला दुर्लभ होता है, उसे श्रेष्ठ तरीके से बतानेवाला उससे भी दुर्लभ, श्रद्धा से सुननेवाला उससे दुर्लभ, और धर्म का आचरण करनेवाला सुबुद्धिमान सबसे दुर्लभ है ।
अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः । दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥
अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान – ये दस धर्म के साधन है ।
सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥
सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहि । इस लिए, तू धर्मपरायण बन ।
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