व्योमनि शम्बाकुरुते चित्रं मुद्रण
व्योमनि शम्बाकुरुते चित्रं निर्माति यत्नतः सलिले ।
स्नपयति पवनं सलिलैः यस्तु खले चरित सत्कारम् ॥

जो इन्सान दुष्ट के साथ अच्छा बर्ताव करता है, वह आकाश में महल रचता है, पानी में यत्नपूर्वक चित्र बनाता है, और वायु को पानी से स्नान कराता है ।