सज्जन
सत्यं माता पिता ज्ञानं मुद्रण ई-मेल
सत्यं माता पिता ज्ञानं
धर्मो भ्राता दया सखा ।
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः
षडेते मम बान्धवाः ॥

सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म बंधु, दया सखा, शांति पत्नी, और क्षमा पुत्र हो – यही मेरे स्नेही हों ।

 
गूढमैथुन धाष्टर्ये च काले मुद्रण ई-मेल
गूढमैथुन धाष्टर्ये च काले चालय सङ्ग्रहम् ।
अप्रमादमनालस्यं पञ्च शिक्षेत वायसात् ॥

एकांत में मैथुन, समर्याद धृष्टता, समय पर घर बनाना, अप्रमाद, और अनालस्य – इन्सान ने ये पाँच गुण कौए से सीखने चाहिए ।

 
शीलं शौर्यमनालस्यं मुद्रण ई-मेल
शीलं शौर्यमनालस्यं पाण्डित्यं मित्रसङ्ग्रहम् ।
अचोरहरणीयानि पञ्चैतान्यक्षयो निधिः ॥

शील, शौर्य, अनालस्य, विद्वत्ता और मित्रसंग्रह – ये पाँच चोरों से भी न चुराये जानेवाले अक्षयनिधि है ।

 
न प्रह्यष्यति सम्मानै मुद्रण ई-मेल
न प्रह्यष्यति सम्मानै र्नावमानैः प्रकुप्यति ।
न क्रुद्धः पुरुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम् ॥

सन्मान मिलने पर अतिहर्षित नहीं होता, अवमान होने पर क्रोधित नहीं होता, और क्रोध आने पर कठोर वाणी नहीं उच्चारता – ये सरल पुरुष के लक्षण है ।

 
उपकर्तुं प्रियं वक्तुं कर्तुं मुद्रण ई-मेल
उपकर्तुं प्रियं वक्तुं कर्तुं स्नेहमकृत्रिमम् ।
सुजनानां स्वभावोऽयं केनेन्दुः शिशिरी कृतः ॥

उपकार करना, प्रिय बोलना, और अकृत्रिम स्नेह करना – ये तीन सज्जनों के स्वभाव के प्रमुख लक्षण हैं ।

 
संसारविषवृक्षस्य द्वे मुद्रण ई-मेल
संसारविषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे ।
काव्यामृतरसास्वादः सङ्गतिः सज्जनैः सह ॥

संसाररुप विषवृक्ष पर दो फल अमृत समान है; काव्यामृत का रसास्वाद, और सज्जनों का समागम ।

 
व्योमनि शम्बाकुरुते चित्रं मुद्रण ई-मेल
व्योमनि शम्बाकुरुते चित्रं निर्माति यत्नतः सलिले ।
स्नपयति पवनं सलिलैः यस्तु खले चरित सत्कारम् ॥

जो इन्सान दुष्ट के साथ अच्छा बर्ताव करता है, वह आकाश में महल रचता है, पानी में यत्नपूर्वक चित्र बनाता है, और वायु को पानी से स्नान कराता है ।

 
परैः प्रोक्ता गुणा यस्य मुद्रण ई-मेल
परैः प्रोक्ता गुणा यस्य
निर्गुणोऽपि गुणी भवेत् ।
इन्द्रोऽपि लघुतां याति
स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः ॥

जब दूसरी व्यक्ति द्वारा गुणानुवाद होता है, तब वह निर्गुण हो तो भी गुणी कहलाता है । पर स्वयं इन्द्र भी यदि अपने गुण गाने लगे, तो वह हीनता को प्राप्त करता है ।

 
वनेऽपि सिंहा गजमांसभक्षिणो मुद्रण ई-मेल
वनेऽपि सिंहा गजमांसभक्षिणो
बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति ।
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता
न नीचकर्माणि समाचरन्ति ॥

जंगल में हाथी का मांस खानेवाला शेर, (कितना भी) भूखा होने के बावजुद जैसे तृण नहीं खाता, वैसे ही कुलीन मनुष्य, संकटों से घिरा हुआ होकर भी नीच कर्म कभी नहीं करता ।

 
आत्मौपम्येन यो वेत्ति मुद्रण ई-मेल
आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् ।
स तथा वञ्च्यते धूतैः ब्राह्मणश्छागतो यथा ॥

जो इन्सान आत्मौपम्य दृष्टि से दुर्जन को सत्यवान समज लेता है, वह धूर्तों का शिकार बनता है; जैसे ब्राह्मण, बकरे को कूत्ता मानकर ठग लिया गया वैसे ।

 
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