स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा । सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥
उपदेश देकर स्वभाव बदला नहीं जाता । पानी को खूब गर्म करने के बावजुद, वह फिर से (अपने स्वभावानुसार) शीत हो हि जाता है ।
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न तेजस्तेजस्वी प्रसृतमपरेषां प्रसहते । स तस्य स्वो भावः प्रकृति नियतत्वादकृतकः ॥
तेजस्वी इन्सान दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता, क्यों कि वह उसका जन्मजात, प्रकृति ने तय किया हुआ स्वभाव है ।
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व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम् । साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम् या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ॥
शेर गहरे जंगल में, और सिंह गुफा में रहता है; हंस विकसित कमलिनी के पास रहेना पसंद करता है, गीध को स्मशान अच्छा लगता है । वैसे हि साधु, साधु की और नीच पुरुष नीच की सोबत करता है; याने कि जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है ।
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निम्नोन्नतं वक्ष्यति को जलानाम् विचित्रभावं मृगपक्षिणां च । माधुर्यमिक्षौ कटुतां च निम्बे स्वभावतः सर्वमिदं हि सिद्धम् ॥
पानी को ऊँचाई और गहराई किसने दिखायी ? पशु – पँछीयों में रही हुई विचित्रता उन्हें किसने सीखायी ? गन्ने में मधुरता और नीम में कटुता कौन लाया ? ये सब स्वभाव से हि सिद्ध होता है ।
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हेलया राजहंसेन यत्कृतं कलकूजितम् । न तद् वर्षशतेनापि जानात्याशिक्षितुं बकः ॥
राजहंस सहज जो नाजुक कलरव करता है, वैसा कलरव सौ साल तक प्रयत्न करनेवाला बगुला नहीं कर सकता ।
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वचो हि सत्यं परमं विभूषणम् यथांगनायाः कृशता कटौ तथा । द्विजस्य विद्यैव पुनस्तथा क्षमा शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ॥
जैसे पतली कमर स्त्री का और विद्या ब्राह्मण का भूषण है, वैसे सत्य और क्षमा परम् विभूषण हैं । पर शील तो शील तो सब मनुष्यों का भूषण है ।
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शीलं रक्षतु मेघावी प्राप्तुमिच्छुः सुखत्रयम् । प्रशंसां वित्तलाभं च प्रेत्य स्वर्गे च मोदनम् ॥
प्रशंसा, वित्तलाभ और स्वर्ग का आनंद – ये तीन सुख पाने की इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान इन्सान ने शील का रक्षण करना चाहिए ।
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वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्वित्तमायाति याति च । अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥
चारित्र्य का रक्षण करना चाहिए । धन तो आता है और जाता है । वित्त से क्षीण होनेवाला क्षीण नहीं है, पर शील से क्षीण होनेवाला नष्ट होता है ।
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अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतद्विदुर्बुधाः ॥
कर्म से, मन से, और वचन से सब प्राणियों का अद्रोह, अनुराग (प्रेम) और दान – इन्हें हि बुद्धिमान लोग शील कहते हैं ।
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परोपदेशकुशलाः दृश्यन्ते बहवो जनाः । स्वभावमतिवर्तन्तः सहस्रेषु अपि दुर्लभाः ॥
दूसरों को उपदेश करने में अनेक लोग कुशल होते हैं, पर उसके मुताबिक वर्तन करनेवाले हज़ारों में एखाद भी दुर्लभ होता है ।
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