अन्तर्गतं महाशल्यं मुद्रण
अन्तर्गतं महाशल्यं अस्थैर्य यदि नोदधृतम् ।
क्रियौषधस्य कः दोषः तदा गुणमयच्छतः ॥

जो अस्थिरता का कंटक मन में रहा है उसे यदि बाहर नहीं निकाला जाय तो, बाद में क्रियारुपी औषध गुणकारक न निकले उस में क्या दोष ?