मन
शरीरं चैव वाचं च मुद्रण ई-मेल
शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।
नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख देखना चाहिए ।

 
पंकैर्विना सरो भाति मुद्रण ई-मेल
पंकैर्विना सरो भाति सभा खलजनै र्विना
कटुवणैर्विना काव्यं मानसं विषयैर्विना ॥

सरोवर कीचडरहित हो तो शोभा देता है, दुष्ट मानव न हो तो सभा, कटु वर्ण न हो तो काव्य और विषय न हो तो मन शोभा देता है ।

 
विद्या हि का ब्रह्मगतिप्रदा वा मुद्रण ई-मेल
विद्या हि का ब्रह्मगतिप्रदा वा
बोधो हि को यस्तु विमुक्तिहेतुः ।
को लाभ आत्मावगमो हि यो वै
जितं जगत्केन मनो हि येन ॥

विद्या कौन सी? जो ब्रह्मगति देती है वह ।
ज्ञान कौन सा ? जो विमुक्तिका कारण बने वह ।
लाभ कौन सा? आत्मा को पहचानना ।
जगत किसने जिता है ? जिस ने मन जिता है ।

 
यदि वहसि त्रिदण्डं मुद्रण ई-मेल
यदि वहसि त्रिदण्डं नग्रमुंडं जटां वा
यदि वससि गुहायां पर्वताग्रे शिलायाम् ।
यदि पठसि पुराणं वेदसिध्धान्ततत्वम्
यदि ह्रदयमशुध्दं सर्वमेतन्न किज्चित् ॥

आदमी त्रिदंड धारण करे, सर पे मुंडन करे, जटा बढाये, गुफा में रहे या पर्वत की चोटी पर, और वेद पुराण व्र सिद्धान्त के तत्व का अभ्यास करे, लेकिन जो ह्रदय साफ़ न हो तो ये सब बेकार है !

 
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं मुद्रण ई-मेल
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुध्दं चाशुध्दमेव च ।
अशुध्दं कामसंकल्पं शुध्दं कामविवर्जितम् ॥

अशुध्द और शुध्द एसे दो प्रकार का मन कहा है, कामना और संकल्प वाला मन अशुध्द और कामना रहित हो वह शुध्द ।

 
अन्तर्गतं महाशल्यं मुद्रण ई-मेल
अन्तर्गतं महाशल्यं अस्थैर्य यदि नोदधृतम् ।
क्रियौषधस्य कः दोषः तदा गुणमयच्छतः ॥

जो अस्थिरता का कंटक मन में रहा है उसे यदि बाहर नहीं निकाला जाय तो, बाद में क्रियारुपी औषध गुणकारक न निकले उस में क्या दोष ?

 
सत्येन शुध्यते वाणी मुद्रण ई-मेल
सत्येन शुध्यते वाणी मनो ज्ञानेन शुध्यति ।
गुरुशुश्रूषया काया शुध्दिरेषा सनातनी ॥

वाणी सत्य से, मन ज्ञान से, काया गुरु की सेवा से शुध्द होती है – ये सनातन शुध्दि है ।

 
दानं पूजा तपश्र्चौव मुद्रण ई-मेल
दानं पूजा तपश्र्चौव तीर्थसेवा श्रुतं तथा ।
सर्वमेव वृथा तस्य यस्य शुध्दं न मानसम् ॥

यदि आदमी का मन शुध्द न हो तो दान, पूजा, तीर्थ, सेवा, सुनना सब व्यर्थ है ।

 
अन्तश्र्चित्तं न चेत् शुध्दं मुद्रण ई-मेल
अन्तश्र्चित्तं न चेत् शुध्दं बहिः शौचे न शौचभाक् ।
सुपकमपि निम्बस्य फ़लं बीजे कटु स्फ़ुटम् ॥

अन्तःचित्त जो शुध्ध न हो तो बाह्य शौच से मानव पवित्र नहीं बनता । नींब का फ़ल पक्का हो तो भी उसका बीज कटु हि होता है ।

 
चंचलं हि मनः कृष्णं मुद्रण ई-मेल
चंचलं हि मनः कृष्णं प्रमाधि बलवद दृठम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

हे कृष्ण यह मन चंचल और बहोत ही चल बनानेवाला है । उसका निग्रह करना वायुकी तरह दुषकर है ।

 
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