दया
क्षान्ति तुल्यं तपो नास्ति मुद्रण ई-मेल
क्षान्ति तुल्यं तपो नास्ति सन्तोषान्न सुखं परम् ।
नास्ति तृष्णा समो व्याधिः न च धर्मो दयापरः ॥

क्षमा जैसा अन्य तप नहि, संतोष जैसा अन्य सुख नहि, तृष्णा जैसा अन्य रोग नहि, दया जैसा अन्य कोई धर्म नहि ।

 
सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं मुद्रण ई-मेल
सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थंमिन्द्रियनिग्रहः ।
सर्वभूतदया तीर्थं सर्वत्रार्जवमेवच ॥

सत्य, क्षमा, इंद्रियनिग्रह, सर्वत्र सरलता, और सब प्राणियों के लिए दया – ये तीर्थरुप है ।

 
परस्मिन् बन्धुवर्गे वा मुद्रण ई-मेल
परस्मिन् बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्ये रिपौ तथा ।
आत्मवद्वर्तितव्यं हि दयैषा परिकीर्तिता ॥

परायों के साथ, वैसे हि अपनों के साथ, मित्र, द्वेष्य (जिनका द्वेष है उनसे), और शत्रु के साथ खुद से करते हैं वैसा वर्तन करना चाहिए । इसी को दया कह्ते हैं ।

 
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