संसारे मानुष्यं सारं मानुष्ये च कौलीन्यम् । कौलिन्ये धर्मित्वं धर्मित्वे चापि सदयत्वम् ॥
संसार में मनुष्यत्व, मनुष्यत्व में खानदानी, खानदानी में धर्मिष्टत्व, और धर्मिष्टत्व में सदयत्व सार (रुप) है ।
दयां विना देव गुरुक्रमार्चाः तपांसि सर्वेन्द्रिययन्त्रणानि दानानि शास्त्राध्ययनानि सर्वं सैन्यं गतस्वामि यथा तथैव ॥
देव और गुरुपूजा, तप, सर्वइंद्रियदमन, दान और शास्त्राध्ययन – ये सब क्रिया दया के बगैर वैसे हैं, जैसी कि सेनापति बगैर का सैन्य ।
न सा दीक्षा न सा भिक्षा न तद्दानं न तत्तपः । न तद् ध्यानं न तद् मौनं दया यत्र न विद्यते ॥
दया के बगैर दीक्षा, भिक्षा, दान, तप, ध्यान, और मौन सब निरर्थक है ।
सर्वे वेदा न तत् कुर्युः सर्वे यज्ञाश्च भारत । सर्वे तीर्थाभिषेकाश्च तत् कुर्यात् प्राणिनां दया ॥
हे भारत ! सब वेद, सब यज्ञ, सब तीर्थ, सब अभिषेक – जो नहि कर सकता है, वह (भी) प्राणियों पर दया तो कर हि सकता है ।
दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि । एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ॥
दयाहीन काम निष्फल है, उस में धर्म नहि । जहाँ दया न हो, वहाँ वेद भी अवेद बनते हैं ।
अहिंसा लक्षणो धर्मोऽधर्मश्च प्राणिनां वधः । तस्मात् धर्मार्थिभिः लोकैः कर्तव्या प्राणिनां दया ॥
धर्म का लक्षण अहिंसा है, और प्राणियों का वध अधर्म है । अर्थात् धर्म की इच्छावाले ने प्राणियों पर दया करनी चाहिए ।
दयाङ्गना सदा सेव्या सर्वकामफलप्रदा । सेवितासौ करोत्याशु मानसं करुणामयम् ॥
सब इच्छित फल देनेवाली दयांगना का सेवन करना चाहिए । यदि सेवन किया जाय तो तुरंत हि वह मन को करुणामय बनाता है ।
लावण्यरहितं रुपं विद्यया वर्जितं वपुः । जलत्यक्तं सरो भाति नैव धर्मो दयां विना ॥
लावण्यरहित रुप, विद्यारहित शरीर, जलरहित तालाब शोभा नहि देते । उसी प्रकार दयारहित धर्म भी शोभा नहि देता ।
न च विद्यासमो बन्धुः न च व्याधिसमो रिपुः । न चापत्यसमो स्नेहः न च धर्मो दयापरः ॥
विद्या जैसा बंधु नहि, व्याधि जैसा कोई शत्रु नहि, पुत्र जैसा स्नेह नहि, और दया से श्रेष्ठ कोई धर्म नहि ।
धर्मो जीवदयातुल्यो न क्वापि जगतीतले । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कार्या जीवदयाऽङ्गिभिः ॥
इस दुनिया में जीवदया के तुल्य धर्म इतर कहीं भी नहि । अर्थात् आपने सर्व प्रयत्न द्वारा जीवदया करनी चाहिए ।
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