अधर्मं धर्ममिति या मन्यते मुद्रण
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

हे पार्थ ! तमोगुण से व्याप्त बुद्धि अधर्म को भी यह धर्म है, ऐसा समज बैठती है; और वैसे हि दूसरी हर बात को भी विपरीत समजती है, वह बुद्धि तामसी है ।