यथा धर्ममधर्मं च कार्यं मुद्रण ई-मेल
यथा धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

हे पार्थ ! इन्सान जिस बुद्धि से धर्म-अधर्म को, कर्तव्य-अकर्तव्य को यथार्थरुप से नहीं जान सकती, वह बुद्धि राजसी है ।

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