ज्ञान
न जातु कामः कामानुपभोगेन मुद्रण ई-मेल
न जातु कामः कामानुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवत्मैर्व भुय एवाभिवर्धते ॥

जैसे अग्नि में घी डालने से वह अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे भोग भोगने से कामना शांत नहीं होती, उल्टे प्रज्वलित होती है ।

 
आशा हि लोकान् बध्नाति मुद्रण ई-मेल
आशा हि लोकान् बध्नाति कर्मणा बहुचिन्तया ।
आयुः क्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि जागृहि ॥

बडी चिंता कराके, कर्मो द्वारा आशा इन्सान को बंधन में डालती है । इससे खुद के आयुष्य का क्षय हो रहा है, उसका उसे भान नहीं रहेता; इस लिए "जागृत हो, जागृत हो ।"

 
एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति मुद्रण ई-मेल
एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः ।
अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥

हे राजन् ! इन्सान का एक हि शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान ।

 
जन्मदुःखं जरादुःखं मुद्रण ई-मेल
जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः पुनः ।
संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ॥

संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार बार आता है, इस लिए (हे मानव !), "जाग, जाग !"

 
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