ज्ञान
यत्ते अग्ने तेजस्तेनाहं मुद्रण ई-मेल
यत्ते अग्ने तेजस्तेनाहं तेजस्वी भूयासम् ।
यत्ते अग्ने वर्चस्तेनाहं वर्चस्वी भूयासम् ।
यत्ते अग्ने हरस्तेनाहं हरस्वी भूयासम् ।

हे अग्नि ! तुम्हारे तेज से मुज़े तेजस्वी बनने दो । तुम्हारे विजयी तेज से मुजे वर्चस्वी बनने दो । सब कचरा जलानेवाले तुम्हारे तेज से मुजे कचरा जलानेवाला बनने दो ।

 
तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति मुद्रण ई-मेल
तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सरिभि
क्षुधार्तः सन् शालीन क्वललयति शाकादिवलितान् ।
प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधू
प्रतीकारं व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥

जब प्यास के कारण गला सुख जाता है, तब मनुष्य स्वादिष्ट, सुगंधी जल पीकर प्यास बुझाता है; भूख से व्याकुल होने पर अनेक मधुर रसयुक्त व्यंजन खाकर अपनी भूख मिटाता है । कामाग्नि प्रदिप्त होने पर, वधू को प्रगाढ आलिंगन पाश में लेकर कामाग्नि को शांत करता है । इस प्रकार दुःख की व्याधि को शमन करने के जो उपाय हैं, उन्हीं को मनुष्य भूल से सुख समजता है ।

 
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया मुद्रण ई-मेल
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयारन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यश्रत्रन्यो अभिचाकशीति ॥

एक साथ रहने वाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी जीवात्मा एवं परमात्मा, एक हि वृक्ष शरीर का आश्रय लेकर रहते हैं । उन दोनों में से एक जीवात्मा तो उस वृक्ष के फल, कर्मफलों का स्वाद ले-लेकर खाता है । किंतु दूसरा, ईश्वर उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ।

 
स्व बालं रोदमानं चिरतरसमयं मुद्रण ई-मेल
स्व बालं रोदमानं चिरतरसमयं शान्तिमानेतुमग्रे
द्राक्षं खार्जूरमाम्रं सुकदलमथवा योजयत्यम्बिकाऽस्य ।
तद्वच्चेताऽतिमय्ठं बहुजनभवान्मौठ संस्कारयोगात्
बोधोपायैरनेकैरवशमुपनिषद् बोधयामास सम्यक् ॥

जिस प्रकार दीर्घ काल से रोते हुए अपने बालक को माँ अंगूर, खजूर, आम, केला आदि देकर शांत करती है, वैसे अनेक बार जन्म-मरण होने से, निर्माण हुए अज्ञान के संस्कार के कारण अतिमूढ बने हुए अवश चित्त को समजानेवाले अनेक उपायों का ज्ञान उपनिषदों ने अच्छी तरह से दिया है ।

 
यश्च मूढतमो लोके यश्च मुद्रण ई-मेल
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुध्धेः परं गतः ।
तावुभौ सुखमेधेते क्लिशयत्यन्तरितो जनः ॥

जो अत्यधिक मूर्ख होते हैं, अथवा जो बुद्धि के परे स्थित परमात्मा स्वरुप को प्राप्त हुए हैं, वे दो ही जन सुखी होते हैं, बीच के मनुष्य क्लेश पाते हैं ।

 
सत्यपि भेदापगमे नाथ मुद्रण ई-मेल
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।
सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः ॥

हे नाथ ! आपका और मेरा भेदभाव चला गया है, फिर भी मैं आपका हूँ, (पर) आप मेरे नहीं है ! जिस प्रकार तरंगें समंदर की है, और ना कि समंदर तरंगों का ।

 
पराञ्चि खानि व्यतृणात् मुद्रण ई-मेल
पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयंभू-
स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-
दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥

स्वयं प्रकट होनेवाले भगवान ने सभी इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जानेवाले हि बनाये हैं । इसलिए, मनुष्य इन्द्रियों द्वारा प्रायः बाहर की वस्तुओं को हि देखता है, अंतरात्मा को नहीं । किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने हि अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों से लौटाकर अंतरात्मा देखा है ।

 
वाग्वैश्वरी शब्दझरी मुद्रण ई-मेल
वाग्वैश्वरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम् ।
वैदुष्यं विदुषां तद्वत् भुङ्क्तये न तु मुक्तये ॥

विद्वानों की वाणी की कुशलता, शब्दों की धारावाहिता, शास्त्रव्याख्या की कुशलता, और विद्वत्ता, भोग के हि कारण हो सकते हैं, मोक्ष के कारण नहीं ।

 
स्वप्नस्त्रीसंगसौरव्यादपि मुद्रण ई-मेल
स्वप्नस्त्रीसंगसौरव्यादपि भृशमसतो या च रेतयुतिः स्यात्
स दृश्या तद्वदेतत्स्फुरति जगदसत्कारणं सत्यकल्पम् ।
स्वप्ने सत्यः पुमान्स्याद्युवतिरह मृषैवानयोः संयुतिश्च
प्रातः शुक्रेण वस्त्रोपहतिरिति यतः कल्पनामूलमेतत् ॥

स्वप्न में जो स्त्रीसंग होता है, वह मिथ्या है, कारण स्त्री हि नहीं है, तो उसका संग कैसे होगा ? परंतु उसके परिणाम स्वरुप जो वीर्यस्खलन होता है, वह सत्य है या नहीं ? वह सत्य है । अर्थात् जगत असत् मिथ्या होगा, फिर भी उसका जो परिणाम है, वह सत्य है ।

स्वप्नस्त्रीसंगसौरव्यादपि भृशमसतो या च रेतयुतिः स्यात्

स दृश्या तद्वदेतत्स्फुरति जगदसत्कारणं सत्यकल्पम् ।

स्वप्ने सत्यः पुमान्स्याद्युवतिरह मृषैवानयोः संयुतिश्च

प्रातः शुक्रेण वस्त्रोपहतिरिति यतः कल्पनामूलमेतत् ॥

 
यतसत्त्वे सत्सत्त्वमन्यः मुद्रण ई-मेल
यतसत्त्वे सत्सत्त्वमन्यः ।
ब्रह्मसत्वे जगतसत्त्वमिति ।
यदभावे तदभावो नेति व्यतिरेकः ।
जगदभावे ब्रह्मभावो नेति ।

ब्रह्म है इसलिए जगत है । यह ब्रह्म का जगत से अनुयोगी संबंध है, जैसे कि पिता का पुत्र से ।
- जगत नहीं है याने ब्रह्म नहीं है, ऐसा नहीं होता । यह प्रतियोगी संबंध, अर्थात् व्यतिरेक है ।

 
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