ज्ञान
इहलोके सुखं हित्वा ये मुद्रण ई-मेल
इहलोके सुखं हित्वा ये तपस्यन्ति दुर्धियः ।
हित्वा हस्तगतं ग्रासं ते लिहन्ति पदाङ्गुलिम् ॥

इहलोक के (पृथ्वी के) सुखों का त्याग करके जो मूढ लोग तप करते हैं, वे हाथ में आया हुआ निवाला छोडकर, मानो पैर की उँगलीयाँ चाटते हैं ! (नास्तिक मत)

 
यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं मुद्रण ई-मेल
यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं कृत्वा धृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥

जितना जिओ, शौख से जिओ; ऋण (लोन) लेकर भी घी पीओ (भोग भुगतो) । भस्मीमभूत होने के बाद, यह देह वापस कहाँ आनेवाला है ? (नास्तिक मत)

 
आर्ता देवान् नमस्यन्ति मुद्रण ई-मेल
आर्ता देवान् नमस्यन्ति तपः कुर्वन्ति रोगिणः ।
अधना दातुमिच्छन्ति वृद्धा नार्यः पतिव्रताः ॥

दुःखी लोग भगवान को नमस्कार करते हैं (करना पडता है); रोगी तप करते हैं (करना पडता है); धनहीन लोग देने की ईच्छा रखते हैं (क्यों कि ईच्छा रखने में क्या जाता है ?); और वृद्ध स्त्री पतिव्रता होती है (क्यों कि उन्हें परपुरुष आश्रय नहीं देता) !

 
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मुद्रण ई-मेल
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं
तदा सर्वज्ञोऽस्मित्य-भवदवलिप्तं मम मनः ।
यदा किंचित् किंचित् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥

जब मैं बहुत कम जानता था, तब मैं हाथी की तरह मदमस्त हो गया था; मैं सर्वज्ञ हूँ ऐसा मेरे मन को गर्व हो गया था । पर जब शयाने लोगों के पास से थोडा थोडा कुछ जानने लगा, तब 'मैं मूर्ख हूँ' ऐसा ध्यान में आते ही बुखार जैसा मेरा मद चला गया ।

 
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः मुद्रण ई-मेल
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥

हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल पसार नहीं हुआ, हम ही पसार हुए हैं; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !

 
आदित्यस्य गतागतै मुद्रण ई-मेल
आदित्यस्य गतागतैरहरहःसंक्षीयते जीवितम्
व्यापारैर्बहुकार्यभार-गुरूभिः कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वाजन्मजराविपत्तिं मरणं त्रासश्च नोत्पद्यते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरा मुन्मत्तभूतं जगत् ॥

सूर्य् के अवागमन से दिनबदिन इन्सान की जिंदगी कम होती जाती है । व्यापार/व्यवसाय के काम में व्यस्त समय कब निकल जाता है, उसका ध्यान नहीं रहेता । जन्म, जरा (बुढापा), विपत्ति और (साक्षात्) मृत्यु देखकर भी हमें डर नहीं लगता ! मोहमय प्रमादरुप दारु पीकर सारा जगत उन्मत्त बना है !

 
अशनं मे वसनं मे मुद्रण ई-मेल
अशनं मे वसनं मे जाया मे बन्धुवर्गो मे ।
इति मे मे कुर्वाणं काल वृको हन्ति पुरुषाजम् ॥

अन्न मेरा, वस्त्र मेरा, स्त्री मेरी, सगे-संबंधी मेरे... ऐसे 'मेरा, मेरा' (मे, मे..) करनेवाले पुरुषरुपी बकरे को, कालरुपी सूअर मार डालता है ।

 
विद्वानेव विजानाति मुद्रण ई-मेल
विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् ।
नहीं बन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ॥

विद्वानों को कितना परिश्रम होता है, वह केवल विद्वान ही समज सकता है । प्रसूति की पीडा क्या होती है, वह वंद्या नहीं जानती !

 
नित्यमाचरतः शौचं मुद्रण ई-मेल
नित्यमाचरतः शौचं कुर्वतः पितृतर्पणम् ।
यस्य नोद्विजते चेतः शास्त्रं तस्य करोति किम् ॥

सदैव शौच विधि का आचरण और पितृतर्पण करने के बावजुद, जिसे वैराग्य खडा नहीं होता, शास्त्र उनका क्या करेगा ?

 
प्रातर्मूत्र पुरीषाभ्यां मुद्रण ई-मेल
प्रातर्मूत्र पुरीषाभ्यां मध्याह्ने क्षुत्पिपासया ।
तृप्ताः कामेन बध्यन्ते प्राणिनो निशि निद्रया ॥

प्राणीयों को सवेरे मल-मूत्र, मध्याह्न में क्षुधा-तृषा और रात को निंद्रा बाधा करते हैं; तृप्त (जिसके पास सब कुछ है) मनुष्य को काम (विषयानुराग) बाधा करता है ।

 
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