सुख-दुःख
अवश्यंभाविभावानां मुद्रण ई-मेल
अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्यदि ।
तदा दुःखैर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिराः ॥

अवश्यंभावि घटनाओं का यदि प्रतीकार हो सकता (उन्हें टाला जा सकता) तो नल, राम और युधिष्ठिर दुःख से अलिप्त रहते !

 
कालः पचति भूतानि मुद्रण ई-मेल
कालः पचति भूतानि कालः संहरते तथा ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥

काल प्राणियों को पकाता है, उनका संहार करता है । सोये हों, तब भी काल तो जागृत होता है, काल को रोक पाना दुर्गम है ।

 
मातुलो यस्य गोविन्दः मुद्रण ई-मेल
मातुलो यस्य गोविन्दः पिता यस्य धनञ्जयः ।
सोऽपि कालवशं प्राप्तः कालो हि दुरतिक्रमः ॥

(स्वयं) कृष्ण भगवान जिसके मामा थे, अर्जुन जैसे पिता थे, वैसा अभिमन्यु भी काल को प्राप्त हुआ । काल को मिटा पाना दुर्गम है ।

 
ऐश्वर्यतिमिरो चक्षुः मुद्रण ई-मेल
ऐश्वर्यतिमिरो चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ।
तस्य निर्मलतायां तु दारिद्र्यं परमौषधम् ॥

ऐश्वर्य से अंध बनी हुई आँख, देखने के बावजुद कुछ देखती नहीं । वैसी आँखों को निर्मल बनाने के लिए दारिद्र्य परम् औषधि है ।

 
शक्तिं करोति सञ्चारे मुद्रण ई-मेल
शक्तिं करोति सञ्चारे शीतोष्णे मर्षयत्यपि ।
दीपयत्युदरे वह्निः दारिद्र्यं परमौषधम् ॥

दारिद्र्य परम् औषधि है, क्यों कि वह संचार करने की शक्ति देता है । शीत और उष्ण सहन कराता है, और पेट में अग्नि प्रज्वलित करता है ।

 
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो मुद्रण ई-मेल
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा सुखं वसेत् ॥

जिसके ह्रदय में स्नेह है उसे भय लगता है, स्नेह यह दुःखका पात्र है, सभी दुःखका मूल है । इसलिए वह दुःख (याने कि स्नेह) छोडकर मानवी ने सुख से रहना चाहिए ।

 
शोकस्थानसहस्त्राणि मुद्रण ई-मेल
शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थान शतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

हर दिन हजारों दुःखकारक और सैंकडों भयप्रद प्रसंग अज्ञानी मानव पर कब्जा पाते हैं, ज्ञानी मानव पर नहीं । (शोक करनेवाले युधिष्ठिर और पुत्र शोक करनेवाले धुतराष्ट्र को सांत्वन देते हुए व्यास और विदूर की उक्ति)

 
सुखस्य दुःखस्य न कोडपि दाता मुद्रण ई-मेल
सुखस्य दुःखस्य न कोडपि दाता
परो ददाति इति कुबुध्दिरेषा ।
अहं करोमीति वृथाभिमानः
स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥

सुख और दुःख देनेवाला कोई नहीं है । दूसरा आदमी हम को वह देता है यह विचार भी गलत है । "मैं करता हूँ" एसा अभिमान व्यर्थ है । सभी लोग अपने अपने पूर्व कर्मों के सूत्र से बंधे हुए हैं । (निषादराज गृहक कैकेयी और मंथराको दोष देता है तब लक्षमण की उक्ति)

 
अपि शाकं पचानस्य मुद्रण ई-मेल
अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मधवन् गृहे ।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कंचन ॥

हे इन्द्र ! किसी पर निर्भर न रहकर अपनी हिंमत से पायी हुई सुखी रोटी भी अपने घर खाने में सुख है ।

 
कल्याणी बत गाथेयं मुद्रण ई-मेल
कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति माम् ।
एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥

"सौ साल बाद भी जीवंत मानवको आनंद होता है" ऐसी जो कहावत है वह कल्याणकारी है एसा मुझे लगता है । (रामके वनवास बाद भरत की हनुमान को उक्ति)

 
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