यो न सञ्चरते देशान् मुद्रण ई-मेल
यो न सञ्चरते देशान् यो न सेवेत पण्डितान् ।
तस्य सङ्कुचिता बुद्धि र्धुतबिन्दु रिवाम्भसि ॥

जो देशों में घूमता नहीं, जो पंडितों की सेवा करता नहीं, उसकी बुद्धि पानी में घी के बिंदुवत् संकुचित रहती है ।

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