रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवाः मुद्रण
रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवाः
न भेजिरे भीमविषेण भीतिं ।
सुधां विना न प्रययुर्विरामम्
न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥

अति मूल्यवान रत्नों के ढेर मिलने पर देव संतुष्ट न हुए, या भयंकर विष निकलने पर वे डरे नहीं; अमृत न मिलने तक वे रुके नहीं (डँटे रहे) । उसी तरह, धीर इन्सान निश्चित किये कामों में से पीछे नहीं हटते ।