नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ । गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥
गुरु के पास हमेशा उनसे छोटे आसन पे बैठना चाहिए । गुरु आते हुए दिखे, तब अपनी मनमानी से नहि बैठना चाहिए ।
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शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च । नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥
शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख देखना चाहिए ।
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योगनिरोधात् भवसंततिक्षयः सन्ततिक्षयान्मोक्षः । तस्मात् कल्याणानां सर्वेषां भाजनं विनयः ॥
योगनिरोध से भवसंतति का क्षय होता है (याने चौंराशी लाख यौनियों में भटकने से बच जाते हैं) और संततिक्षय से मोक्ष मिलता है – इस लिए विनय सब कल्याण का भाजन (स्थान) है ।
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विनय फलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुत ज्ञानम् । ज्ञानस्य फलं विरतिः विरतिफलं चाश्रव निरोधः ॥
विनय का फल सेवा है, गुरुसेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है, और विरक्ति का फल आश्रवनिरोध है ।
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यथा नमन्ति पाथोभिः पाथोदाः फलदाः फलैः । नमन्ति विनयेनैव तद्वदुत्तमपूरुषाः ॥
जैसे फल देनेवाले वृक्ष फल से झुकते हैं, वैसे उत्तम पुरुष विनय से झुकते हैं ।
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आत्मानं भावयेन्नित्यं ज्ञानेन विनयेन च । मा पुन र्म्रियमाणस्य पश्चात्तापो भविष्यति ॥
ज्ञान से और विनय से आत्मा का नित्य चिंतन करना, कि जिससे मरते वक्त पश्चाताप न हो ।
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विनयायत्ताश्च गुणाः सर्वे विनयश्च मार्दवायत्तः । यस्मिन् मार्दवमखिलं स सर्वगुणभाक्त्वमाप्नोति ॥
सब गुण विनय के आधीन है, और विनय कोमलता को आधीन है; याने जिसमें मार्दव हो, वह सब गुणों को प्राप्त करता है ।
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श्रुतशीलमूलनिकषो विनीतविनयो यथा नरो भाति । न तथा सुमहार्घैरपि वस्राभरणैरलङ्क तो भाति ॥
जितनी श्रुत और शील की कसौटी रुप संस्कार और विनय से मनुष्य की शोभा होती है, उतनी मूल्यवान वस्त्र और अलंकारों से मंडित होकर भी नहि होती ।
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का सम्पदविनीतस्य का मैत्री चलचेतसः । का तपस्या विशीलस्य का कीर्तिः कोपवर्तिनः ॥
असंस्कारी को संपद कहाँ से ? चंचल चित्तवाले को मैत्री कहाँ से ? शील बिना तपस्या कहाँ से ? क्रोधी को कीर्ति कहाँ से ?
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विनयः कारणं मुक्तेः विनयः कारणं श्रियः । विनयः कारणं प्रीतेः विनयः कारणं मतेः ॥
विनय मुक्ति का, संपत्ति का, प्रीति का और मति का कारण है ।
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