रुपवांश्चापि मूर्खोऽपि मुद्रण
रुपवांश्चापि मूर्खोऽपि गत्वा च विपुलां सभाम् ।
संरक्षेच्च स्विकां जिह्वां भार्यां दुश्चारिणीं यथा ॥

मूर्ख इन्सान स्वरुपवान हो तब भी बडी सभा में हो तब, दुश्चारिणी स्त्री की तरह, अपनी जीभ की रक्षा करनी चाहिए (मौन रहना चाहिए) ।