मूर्ख
मुक्ताफलैः किं मृगपक्षिणां च मुद्रण ई-मेल
मुक्ताफलैः किं मृगपक्षिणां च
मिष्टान्नपानं किमु गर्दभानाम् ।
अनधस्य दीपो बधिरस्य गीतम्
मूर्खस्य किं धर्मकथाप्रसंगैः ॥

मृग और पंछी को मुक्ताफल क्या काम के ? गधे को मिष्टान्न से क्या लाभ ? अंधे को दिया, और बहरे को गीत क्या काम के ? (वैसे हि) मूर्ख को धर्मकथा गान से क्या फायदा ?

 
शक्यो वारयितुं जलेन मुद्रण ई-मेल
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभूक् छम्नेण सूर्योतपो
नागेन्द्रो निशितांकुशेन समदौ दण्डेन गोगर्दभौ ।
व्याधिर्मेषजसंग्नहैश्च विविधै र्मन्त्रप्रयोगै र्विषम्
सर्वसयौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नासूत्यौषधम् ॥

अग्नि को पानी से शांत किया जा सकता है, छाते से सूर्य की धूप को, तिक्ष्ण अंकुश से हाथी को, लकडी से मदोन्मत्त भैंसे या घोडे को काबू में किया जा सकता है; अलग अलग दवाईयों से रोग, और विविध मंत्रों से झहर दूर हो सकता है; सभी चीज़ के लिए शास्त्रों में औषध है, लेकिन मूर्ख के लिए कोई ओसड नहीं है ।

 
मूर्खत्वं हि सखे ममापि रुचितं मुद्रण ई-मेल
मूर्खत्वं हि सखे ममापि रुचितं तस्मिन् यदष्टौ गुणाः
निश्चिन्तो बहुभोजनोऽतिमुखरो रात्रिं दिवा स्वप्लभाक् ।
कार्याकार्यविचारणान्धबधिरो मानापमाने समः
प्रायेणामयवर्जितो दृढवपुः मूर्खः सुखं जीवति ॥

हे मित्र ! मुज़े मूर्खत्व बहुत पसंद है, क्यों कि उस में आठ गुण है; मूर्ख मानव निश्चित खूब खानेवाला, खूब बोलनेवाला, रात-दिन स्वप्न में घूमनेवाला, योग्य-अयोग्य कार्य के सोचने में अँधा और बहेरा, मान-अपमान जिसके मन समान है, ऐसा निरोगी और पुष्ट शरीरवाला (मूर्ख) सुख से जीता है ।

 
प्रायेणात्र कुलन्वितं कुकुलजाः मुद्रण ई-मेल
प्रायेणात्र कुलन्वितं कुकुलजाः श्री वल्लभं दुर्भगाः
दातारं कृपणा ऋजूननृजस्तेजस्विनं कातराः ।
वैरूप्योपहताश्च कान्तवपुषं धर्माश्रयं पापिनो
नानाशास्त्रविचक्षणं च पुरुषं निन्दन्ति मूर्खा जनाः ॥

ज़ादा करके नीच कुल में जन्मे हुए, कुलवान की; दुर्भागी, धनवान की; कृपण, दातार की; कुटिल, सरल स्वभाववालों की; डरपोक, तेजस्वी की; कुरुप, रुपवान की; पापी, धर्मनिष्ठों की; और मूर्ख लोग, शास्त्र में पारंगत की, निंदा करते हैं ।

 
यथा खरश्चन्दनभारवाही मुद्रण ई-मेल
यथा खरश्चन्दनभारवाही
भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ।
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीपत्य
चार्थेषु मूढाः खरवत् वहन्ति ॥

जैसे चन्दन के भार को वहन करनेवाला गधा, भार को हि जानता है, नहीं कि चंदन को ! वैसे हि मूर्ख लोग, कई शास्त्रों के अभ्यास करके भी अर्थ के बारे में गधे की तरह भार हि वहन करते हैं ।

 
खादन्न गच्छामि हसन्न जल्पे मुद्रण ई-मेल
खादन्न गच्छामि हसन्न जल्पे
गतं न शोचामि कृतं न मन्ये ।
द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन्
किं कारणं भोज भवामि मूर्खः ॥

हे भोज ! मैं खाते खाते जाता नहीं हूँ; हँसते हँसते बोलता नहीं हूँ; बीते हुए का शोक नहीं करता; किये हुए का अभिमान नहीं करता; दो लोग बात करते हो, तब बीच में तीसरा नहीं बनता; तो फिर किस कारण से मैं मूर्ख बना ?

 
अज्ञः सुखमाराधयः मुद्रण ई-मेल
अज्ञः सुखमाराधयः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्घं ब्रह्मापि तं नरं न रज्जयति ॥

अज्ञ मानव को आसानी से समजाया जा सकता है; विशेष जानकार को तो उस से भी ज़ादा जल्दी समजाया जा सकता है; लेकिन जो थोडे ज्ञान से घमंडी बन गये हैं, उन को तो ब्रह्मा भी नहीं समजा सकते ।

 
मदोपशमनं शास्त्रं मुद्रण ई-मेल
मदोपशमनं शास्त्रं खलानां कुरुते मदम् ।
चक्षुः प्रकाशकं तेजः उलूकानामिवान्धताम् ॥

आँख को प्रकाश देनेवाला तेज, घुवड को अँधेरा देता है; वैसे हि मद को शांत करनेवाला शास्त्र दृष्टों में मद उत्पन्न करता है ।

 
अत्याचारो ह्यनाचारो मुद्रण ई-मेल
अत्याचारो ह्यनाचारोऽत्यन्तनिन्दाऽति संस्तुतिः ।
अतिशौचमशौचं च षड्विधं मूर्ख लक्षणम् ॥

अत्याचार, अनाचार, अत्यंद निंदा, अत्यंत स्तुति, अतिशौच, और अशौच - ये छे मूर्ख के लक्षण हैं ।

 
मूर्खोऽपि मूर्ख दृष्ट्वा मुद्रण ई-मेल
मूर्खोऽपि मूर्ख दृष्ट्वा च चन्दनादपि शीतलः ।
यदि पश्यति विद्वांसं मन्यते पितृदघातकम् ॥

मूर्ख मानव दूसरे मूर्ख को देखकर, उसको चंदन से भी ज़ादा शीतल समजते हैं । लेकिन, अगर विद्वान को देखें तो उन्हें पितृघातक मानते हैं ।

 
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