मूर्ख
मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते मुद्रण ई-मेल
मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसंचितम् ।
दम्पतयोः कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता ॥

जहाँ मूर्ख पूजे नहीं जाते, धन का सम्यक् संग्रह होता है, पति-पत्नी के बीच कलह नहीं होता, वहाँ लक्ष्मी अपने आप आती है ।

 
मूर्खस्य परिहर्तव्यः मुद्रण ई-मेल
मूर्खस्य परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।
भिनति वाक्यशब्देन अदृशः कष्टको यथा ॥

जैसे दिखता नहीं फिर भी पैर में रहा कंटक चूभता है; वैसे जो वाक्यबाण से पीडा देता है, ऐसे साक्षात् छे पैर के पशु, ऐसे मूर्ख का त्याग करना चाहिए ।

 
अरण्यरुदितं कृतं मुद्रण ई-मेल
अरण्यरुदितं कृतं शवशरीरमुद्वर्तितम्
स्थलेऽब्जमवरोपितं सुचिरमूषरे वर्षितम् ।
श्वपुच्छमवनामितं बधिरकर्णजापः कृतः
धृतोऽन्धमुखदर्पणो यदबुधो जनः सेवितः ॥

मूर्ख मानव की सेवा करना, अरण्य में रुदन करने जैसा, मुर्दे को सुगंधी द्रव्य लगाने जैसा, जमीन पर कमल उगाने जैसा, बंजर जमीन पर बारिस जैसा, कूत्ते की पूँछ सीधी करने जैसा, और अँधे के सामने आयना रखने जैसा व्यर्थ है ।

 
यस्य नास्ति विवेकस्तु मुद्रण ई-मेल
यस्य नास्ति विवेकस्तु केवलं यो बहुश्रुतः ।
न स जानाति शास्त्रार्थान् दर्वी पाकरसानिव ॥

जैसे चमच, रसोई के स्वाद को नहीं जानती, वैसे केवल बहुत पढा/सुना हो, पर विवेकी न हो, वह शास्त्रार्थ को नहीं जानता ।

 
अंतःसारविहीनस्य सहायः मुद्रण ई-मेल
अंतःसारविहीनस्य सहायः किं करिष्यति ।
मलयेऽपि स्थितो वेणुर्वेणुरेव न चन्दनः ॥

अपने आप में हि सत्त्व न हो, तो मित्र क्या कर सकते हैं ? मलय पर्वत पर रहा बांस, बांस हि रहा है, चंदन नहीं बना !

 
मूर्खचिह्नानि षडिर्तिचनं मुद्रण ई-मेल
मूर्खचिह्नानि षडिर्तिचनं गर्वो दुर्वचनं मुखे ।
विरोधी विषवादी च कृत्याकृत्यं न मन्यते ॥

अभिमान, मुख में दुर्वचन, विरोध करना, कटु वाणी, कटु कृत्य, और अकृत्य में अविवेकीता - ये छे मूर्ख के लक्षण हैं ।

 
काचः काञ्चनसंसर्गात् मुद्रण ई-मेल
काचः काञ्चनसंसर्गात् धत्ते मारकतीं धुतिम् ।
तथा सत्सन्निधानेन मूर्खो याति प्रवीणम् ॥

काच सुवर्ण के संयोग से मरकत मणि की शोभा धारण करता है; वैसे हि मूर्ख मानव, अच्छे लोगों की सोबत से प्रविण बनते हैं ।

 
किं मिष्टमन्नं खरसूकराणाम् मुद्रण ई-मेल
किं मिष्टमन्नं खरसूकराणाम्
किं रत्नहारः मृगपक्षिणां च ।
अंधस्य दीपः बधिरस्य गीतम्
मूर्खस्य किं शास्त्रकथा प्रसंगः ॥

गधे और सूअर को मिष्टान्न किस काम का ? मृग और पंछी को रत्न का हार किस काम का ? अंधे को दिया और बहरे को गीत किस काम का ? वैसे हि, मूर्ख मानव को शास्त्रकथा के प्रसंग किस काम के ?

 
गच्छ सूकर भद्रं ते मुद्रण ई-मेल
गच्छ सूकर भद्रं ते वद सिंहो मया हृतः ।
पण्डिता एव जानन्ति सिंह सूकरयो र्बलम् ॥

हे सूअर ! जा तेरा कल्याण होगा । "मैंने सिंह को मार दिया है", ऐसा सबको कहता है; लेकिन सिंह विरुद्ध सूअर का बल कितना है, वह तो पंडित जानते हि है ।

 
वरं दरिद्रः श्रुति शास्त्रपारगः मुद्रण ई-मेल
वरं दरिद्रः श्रुति शास्त्रपारगः
न चापि मूर्खो बहुरत्नसंयुतः ।
सुलोचना जीर्णपटापि शोभते
न नेत्रहीना कनकैरलंकृता ॥

कई रत्नों से युक्त मूर्ख मानव से, श्रुति और शास्त्र में पारंगत ऐसा दरिद्री बेहतर है । सुलोचना (स्त्री) फटे हुए वस्त्रों में भी सुंदर लतगी है, पर नेत्रहीन स्त्री सुवर्ण से सजी हो, फिर भी अच्छी नहीं लगती ।

 
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