मूर्खो द्विजातिः स्थविरो गृहस्थः कामी दरिद्रो धनवांस्तपस्वी । वेश्या कुरूपा नृपतिः कदर्यो लोके षडेतानि विडम्बितानि ॥
उच्च कुल में जन्मने के बावजुद जो मूर्ख रहा हो, वृद्ध होने के बावजुद घर में बैठा हो, निर्धन होने के बावजुद अनेक कामना करता हो, धनवान होते हुए भी कष्ट सहता हो, वेश्या कद्रुपी हो, राजा कंजुस हो – ये छे हास्यास्पद बनते हैं ।
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रुपवांश्चापि मूर्खोऽपि गत्वा च विपुलां सभाम् । संरक्षेच्च स्विकां जिह्वां भार्यां दुश्चारिणीं यथा ॥
मूर्ख इन्सान स्वरुपवान हो तब भी बडी सभा में हो तब, दुश्चारिणी स्त्री की तरह, अपनी जीभ की रक्षा करनी चाहिए (मौन रहना चाहिए) ।
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स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः । विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥
स्वयं के आधीन, और केवल गुणों से युक्त मौन, ब्रह्मा ने अज्ञान छीपाने के आवरणरुप हि बनाया है; खास तौर पे ज्ञानीयों की सभा में मूर्खो के लिए, मौन अलंकार रुप है ।
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दुर्बलस्य बलं राजा बालानां रोदनं बलम् । बलं मूर्खस्य मौनित्वं चौराणामनृतं बलम् ॥
दुर्बलों का बल राजा है; बच्चों का बल रुदन है; मूर्खो का बल मौन है; और चोरों का बल असत्य है ।
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अव्यापारेषु व्यापारं यो नरःकर्तुमिच्छति । स तत्र निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥
जो इन्सान न करने का काम करता है उसका वहीं निधन होता है, जैसे कीला उखाडने वाला बंदर मर गया वैसे ।
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यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि सेवितम् । यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति ॥
कोई एखाद वृक्ष का मूल किसी दूसरे से जा मिलाया; फिर उसे किसी व्यक्ति को दिया, तो सर्वथा अनिष्ट ही होगा (होने में क्या शेष बचेगा ?) ।
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मूर्खो नही ददाति अर्थं नरो दारिद्र्यशंकया । प्राज्ञः तु वितरति अर्थं दारिद्र्यशंकया ॥
खुद दरिद्री बन जायेगा, इस डर से मूर्ख दान नहीं देता; पर समजदार इन्सान, भविष्य में गरीबी आने पर दान नहीं दे पायेगा, यह सोचकर अभी हि देता रहता है ।
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यदा किंञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम् तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनसकाशादवगतं तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥
जब मैं थोडा जाननेवाला बना, तब हाथी जैसा मदांध हुआ; तब मैं सर्वज्ञ हूँ, ऐसा समजकर मेरा मन घमंडी बना । लेकिन, जब ज्ञानी लोगों के संसर्ग से थोडा थोडा समजने लगा, तब मैं मूर्ख हूँ, ऐसा भान हुआ; और मेरा गर्व बुखार की तरह चला गया ।
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मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे । हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते ॥
गर्व, मुख में दुर्वचन, हठी स्वभाव, विषाद, और दूसरों का न मानना - ये पाँच मूर्ख के लक्षण हैं ।
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आलस्यं गार्वितं निंद्रा परहस्ते च लेखकः । अल्पबुद्धि र्विवादो च मूर्खाणां लक्षणानि षट् ॥
आलस्य, गर्व, निंद्रा, दूसरे के पास लिखाना, अल्पबुद्धि और विवाद - ये छे मूर्ख के लक्षण हैं ।
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