दत्तमिष्टं तपस्तप्तं तीर्थसेवा मुद्रण ई-मेल
दत्तमिष्टं तपस्तप्तं तीर्थसेवा तथा श्रुतम् ।
सर्वेऽप्यभय दानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

इच्छित वस्तु का दान, तप का आचरण, तीर्थसेवा, ज्ञान – ये सब अभयदान की शोभा के सोलहवें भाग जितने भी नहीं ।

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