अभय
नाभिषेको न संस्कारः मुद्रण ई-मेल

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने ।
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेंद्रता ॥

There is no official coronation (RaajyaBhishek) ceremony held or any samskar performed to declare that Lion is the king of jungle. He becomes king by his own attributes and heroism ('Parakram').

सिंह को जंगल का राजा नियुक्त करने के लिए न तो कोई अभिषेक किया जाता है, न कोई संस्कार । अपने गुण और पराक्रम से वह खुद ही मृगेंद्रपद प्राप्त करता है ।

 
भूताभयप्रदानेन मुद्रण ई-मेल
भूताभयप्रदानेन सर्वान्कामानवामुयात् ।
दीर्घमायुः च लभते सुखी चैव सदा भवेत् ॥

प्राणियों को अभय देकर सब कामना प्राप्त होती है, दीर्घायुष्य और सदा सुख प्राप्त होता है ।

 
यो ददाति सहस्त्राणि मुद्रण ई-मेल
यो ददाति सहस्त्राणि गवामश्व शतानि च ।
अभयं सर्वसत्वेभ्य स्तद्दानमिति चोच्यते ॥

जो हजारों गाय और सैंकडो घोडे देता है, और सब प्राणियों को अभय देता है, उसे दान कहते हैं ।

 
अभयं सर्वसत्वेभ्यो यो मुद्रण ई-मेल
अभयं सर्वसत्वेभ्यो यो ददाति दयापरः ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥

जो दयालु सब प्राणियों को अभय देता है, उसे मृत्यु के पश्चात् कहीं से भी भय नहीं रहता ।

 
यो भूतेष्वभयं दद्यात् मुद्रण ई-मेल
यो भूतेष्वभयं दद्यात् भूतेभ्यस्तस्य नो भयम् ।
यादृग् वितीर्यते दानं तादृगासाद्यते फलम् ॥

जो प्राणियों को अभय देता है, उसे प्राणियों से भय नहीं रहेता । जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही फल मिलता है ।

 
एकतः काञनो मेरुः मुद्रण ई-मेल
एकतः काञनो मेरुः बहुरत्ना वसुन्धरा ।
एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् ॥

(तराजु के) एक पलडे में सुवर्ण का मेरु पर्वत, और बहुरत्ना वसुंधरा है, और दूसरे में भयभीत प्राणी को दिया हुआ जीवनदान है (दोनों समान है) ।

 
महतामपि दानानां मुद्रण ई-मेल
महतामपि दानानां कालेन क्षीयते फलम् ।
भीताऽभय प्रदानस्य क्षय एव न विद्यते ॥

बडे दान का भी समय आने पर क्षय होता है । पर भयभीत हुए को अभयदान दिया हो, उसका क्षय नहीं होता ।

 
दत्तमिष्टं तपस्तप्तं तीर्थसेवा मुद्रण ई-मेल
दत्तमिष्टं तपस्तप्तं तीर्थसेवा तथा श्रुतम् ।
सर्वेऽप्यभय दानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

इच्छित वस्तु का दान, तप का आचरण, तीर्थसेवा, ज्ञान – ये सब अभयदान की शोभा के सोलहवें भाग जितने भी नहीं ।

 
यो दद्यात् काञ्चनं मेरुं मुद्रण ई-मेल
यो दद्यात् काञ्चनं मेरुं कृत्स्नां चैव वसुन्धराम् ।
एकस्य जीवितं दद्यात् न च तुल्यं युधिष्ठिर ॥

हे युधिष्ठिर ! जो सुवर्ण, मेरु और समग्र पृथ्वी दान में देता है, वह (फिर भी) एक मनुष्य को जीवनदान देनेवाले दान का मुकाबला नहीं कर सकता ।

 
हेमधेनुधरादीनां दातारः मुद्रण ई-मेल
हेमधेनुधरादीनां दातारः सुलभा भुवि ।
दुर्लभः पुरुषः लोके यः प्राणिष्वभयप्रदः ॥

इस दुनिया में सोना (सुवर्ण), गाय, पृथ्वी (ज़मीन) इ. देनेवाले सुलभ है, पर प्राणीयों को अभयदान देनेवाले इन्सान दुर्लभ हैं ।

 
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