अमरैरमृतं न पीतमब्धेः मुद्रण ई-मेल
अमरैरमृतं न पीतमब्धेः न च हालाहलमुल्बणं हरेण ।
विधिना निहितं खलस्य वाचि द्वयमेतत् बहिरेकमन्तरान्यत् ॥

सागर में से देवों ने अमृत न पीया, शंकरने भयंकर झहर न पीया; वह अमृत और झहर ब्रह्मा ने दुष्टकी वाणी में रखा – एक बाहर, एक अंदर ।

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