त्यकत्वापि निजप्राणान् मुद्रण ई-मेल
त्यकत्वापि निजप्राणान् परहितविध्नं खलः करोत्येव ।
कवले पतिता सद्यो वमयति खलु मक्षिकाऽन्नभोक्तारम् ॥

अपने प्राण त्याग कर भी दुष्ट मानव दूसरे को विध्नरुप बनता है । अनाज के निवाले में पडी मख्खी अनाज खानेवाले को उल्टी कराती है ।

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