स्नेहेन भूतिदानेन कृतः मुद्रण
स्नेहेन भूतिदानेन कृतः स्वच्छोऽपि दुर्जनः ।
दर्पण्श्र्चान्तिके तिष्ठन् करोत्येकमपि द्विधा ॥

स्नेह से और उन्नति करने के बावजुद दुर्जन, और तेल व भस्म से स्वच्छ करने के बावजुद दर्पण, पास रहनेवाले को एक में से दो कर देते हैं (छिन्न भिन्न कर देता हैं) ।